लोकधुनों का एक युग मौन: राजस्थानी संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने वाले के.सी. मालू को श्रद्धांजलि

Tuesday, Jul 14, 2026-02:15 PM (IST)

लोकधुनों का एक युग मौन: राजस्थानी संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने वाले के.सी. मालू को श्रद्धांजलि

लेखिका: नीति गोपेन्द्र भट्ट

कुछ व्यक्तित्व केवल अपना जीवन नहीं जीते, बल्कि पूरी संस्कृति की पहचान बन जाते हैं। उनके जाने का दुख केवल परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक समाज अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों का अनमोल अध्याय खो देता है। राजस्थान के लोक संगीत और लोक संस्कृति के ऐसे ही महान साधक थे केशरी चंद मालू (के.सी. मालू), जिनके निधन के साथ राजस्थानी लोकसंगीत का एक स्वर्णिम युग मानो मौन हो गया।

उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि यदि संकल्प मजबूत हो तो एक व्यक्ति भी पूरी सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिला सकता है। जिस दौर में लोक संगीत आधुनिकता की चमक में कहीं पीछे छूटता जा रहा था, उस समय के.सी. मालू ने उसे न केवल संरक्षित किया, बल्कि देश-दुनिया के मंचों तक सम्मानपूर्वक पहुंचाया।

व्यावसायिक परिवार से होने के बावजूद उन्होंने पारिवारिक व्यापार का रास्ता छोड़ लोक संस्कृति की सेवा को अपना जीवन बना लिया। वर्ष 1987 में स्थापित वीणा म्यूजिक ने राजस्थान के लोकसंगीत को नई दिशा दी। यही वह मंच बना, जहां हजारों लोकगीतों, लोक कलाकारों और पारंपरिक धरोहरों को नया जीवन मिला। "घूमर", "चीरमी", "कांगसियो" जैसे लोकप्रिय लोकगीतों की व्यापक पहचान के पीछे उनकी दूरदृष्टि और समर्पण था।

के.सी. मालू ने 5,000 से अधिक लोकगीतों का संकलन, ध्वनिलिपि और ऑडियो रिकॉर्डिंग तैयार कर ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज तैयार किया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। यह कार्य उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के अपने निजी संसाधनों से किया।

वे केवल संगीत निर्माता नहीं थे, बल्कि प्रतिभाओं के सच्चे संरक्षक भी थे। उन्होंने सैकड़ों नए लोक कलाकारों को मंच दिया और उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज राजस्थान के अनेक प्रतिष्ठित कलाकार अपने सफर की शुरुआत के लिए उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।

सुर-संगम संस्थान के माध्यम से उन्होंने संगीत प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक आयोजनों और लोक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाया। हजारों युवाओं को भारतीय संगीत से जोड़ा तथा लगभग 5,000 युवतियों को घूमर नृत्य का प्रशिक्षण दिलाकर लोक संस्कृति के संरक्षण का अनूठा अभियान चलाया।

वर्ष 1987 की ऐतिहासिक लता मंगेशकर नाइट उनके सामाजिक सरोकारों का भी उदाहरण रही। अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए आयोजित इस कार्यक्रम से एक करोड़ रुपये की राशि जुटाकर उन्होंने साबित किया कि कला समाज सेवा का भी प्रभावी माध्यम बन सकती है।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में 221 राजस्थानी विवाह गीतों का व्यापक संकलन भी शामिल है। हिन्दी, अंग्रेज़ी और राजस्थानी भाषा में प्रकाशित यह कार्य राजस्थान की लोक परंपराओं का जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज माना जाता है।

राजस्थान सरकार ने उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "राजस्थान रत्न" से सम्मानित किया। इसके अलावा राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का "समग्र कला साधना पुरस्कार", महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन का "डागर घराना अवॉर्ड", यूनेस्को चेतना अवॉर्ड और अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से उन्हें अलंकृत किया गया।

1946 में चूरू जिले के सुजानगढ़ में जन्मे केशरी चंद मालू ने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की तथा साहित्य और जैन दर्शन का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन राजस्थानी लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को समर्पित कर दिया।

आज भले ही के.सी. मालू हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी संरक्षित लोकधुनें, उनके तैयार किए कलाकार और उनकी सांस्कृतिक विरासत उन्हें सदैव जीवित रखेगी। जब भी राजस्थान की मिट्टी में घूमर की ताल गूंजेगी, विवाहों में पारंपरिक गीत सुनाई देंगे या कोई युवा कलाकार मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति देगा, तब के.सी. मालू की साधना की प्रतिध्वनि अवश्य सुनाई देगी।

राजस्थान ने केवल एक संगीत मर्मज्ञ नहीं खोया है, बल्कि अपनी लोक-सांस्कृतिक चेतना के एक महान प्रहरी को विदाई दी है।

उनकी स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उस लोक विरासत को सुरक्षित रखें, जिसके संरक्षण के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनके दोनों पुत्र हेमजीत मालू और प्रसन्नजीत मालू निश्चित ही इस सांस्कृतिक विरासत और उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने का कार्य करते रहेंगे।
 


Content Editor

Kuldeep Kundara

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