खामोश ज़िंदगी चीख रही है अंदर से, गुज़रता हुआ वक़्त किस जगह पे ले आया

Wednesday, May 13, 2026-06:05 PM (IST)

खामोश ज़िंदगी चीख रही है अंदर से।
जैसे दरिया में लहर उठ रही है अंदर से।

 

हम जैसे लोगों में बस यही कमी है रक़ीब।
जैसे दिखते हैं, हम वैसे नहीं है, अंदर से।
 

याद से, याद रखता हूँ, कि तुझे भूलना है।
पर शायद भूलने का मन नहीं है, अंदर से।

 

गुज़रता हुआ वक़्त किस जगह पे ले आया।
मेरे बिना दरवाज़ा खुलता नहीं है, अंदर से।

 

एक लाश रोज़ सुबह काम पर जाती है।
ढोंग करती है ज़िंदा है, मर चुकी है, अंदर से।

 

तू लिखता गुनाहों का देवता तो कैसा होता दीप।
सुधा अपने हाथ पीले कर रही है, चन्दर से।


Content Editor

Anil Jangid

सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News