सदन चले शालीनता से, पर बहस हो सार्थक– विधानसभा अध्यक्ष देवनानी
Sunday, Aug 31, 2025-07:01 PM (IST)

1 सितंबर 2025 से राजस्थान विधानसभा सत्र का आगाज़ हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष की तैयारियों के बीच राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने पंजाब केसरी टीवी डिजिटल एडिटर विशाल सूर्यकांत के साथ पॉडकास्ट में विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत बात की। इस पॉडकास्ट को आप पंजाब केसरी के डिजिटल व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर देख सकते हैं। पढ़िए विधानसभा सत्र संबंधी सवाल-जवाब के कुछ अंश...
पंजाब केसरी – विधानसभा सत्र शुरु हो रहा है, आपने सर्वदलीय बैठक बुलाई लेकिन विपक्ष नहीं आया, कैसे चलेगा सदन ?
वासुदेव देवनानी – मैंनें ये परंपरा शुरु की थी कि सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाकर विधानसभा में पक्ष और विपक्ष के नेता साथ बैंठे । तीन बार ऐसा हुआ है कि सर्वदलीय बैठक हुई है। इस बार विपक्ष नहीं आया। असल में, विधानसभा सत्र कैसे चलेगा ये तो दोनों पक्षों को ही तय करना है. मेरी कोशिश रहती है कि सार्थक संवाद रहे, अच्छी बहस हो । प्रदेश की जनता के मुद्दों पर विस्तार से बात हो। मैंने इस बार भी इसी मंशा से प्रयास किया है। विपक्ष के साथी नहीं आ पाए लेकिन सभी को सदन में तो आना ही होगा। मुझे विश्वास है कि सभी के सहयोग से ठीक से विधानसभा चलेगी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ में लेकर इस सत्र में सार्थक चर्चा होगी ।
पंजाब केसरी – पिछली बार लगातार तल्खी का माहौल रहा है, विधायक के निलंबन, विधायकों का वैल में धरना इत्यादि घटनाक्रम सामने आया था।
वासुदेव देवनानी – ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि सत्ता पक्ष औऱ विपक्ष दोनों राज्य के इस सर्वोच्य सदन में अपनी-अपनी बात प्रभावी तरीके से ऱखना चाहते हैं, उन्हें अपनी बात रखनी भी चाहिए लेकिन विधानसभा नियम और परंपराओं से चलता है। यह बात सभी जानते हैं, कई बार आवेश के अतिरेक में कुछ कदम उठाते हैं तो हाउस को ऑर्डर में लाना होता है। तुलनात्मक रूप से देखएं तो राजस्थान विधानसभा में काफी काम होता है। बहस आधी रात तक चलती हैं। विधायक गहरी तैयारी के साथ आते थे। जब मर्यादाएँ टूटती हैं और कोई सदस्य हंगामा करता है तो विवश होकर सदन स्थगित करना पड़ता है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। विपक्ष की भूमिका सत्ता पक्ष जितनी ही महत्वपूर्ण है। अगर बहस होगी तो जनता तक उनकी आवाज पहुँचेगी। लोकतंत्र की असली ताक़त संवाद, चर्चा और बहस में है।
पंजाब केसरी – विधायकों के सवालों के जबाव की क्या स्थिति है, राजस्थान विधानसभा में कई बार ये बड़ा मुद्दा बना है ?
वासुदेव देवनानी – देखिए, डिजिटलाईज़ेशन से बहुत फायदा हुआ है। अब विधायक ऑनलाइन ध्यानाकर्षण, प्रश्न और पर्चियाँ दे सकते हैं। जनता भी वेबसाइट खोलकर देख सकती है कि किस विधायक ने कौन-सा प्रश्न पूछा और क्या जवाब मिला। इससे पारदर्शिता लगातार बढ़ रही है। हमने मॉनिटरिंग की व्यवस्था बनाई है। मंत्रियों और उनके सचिवों से भी सीधे संवाद किया जाता है। इसका लाभ यह हुआ कि पिछले सत्र में लगभग 9800 प्रश्न आए थे, जिनमें से 90% का उत्तर समय पर मिल गया। पहले ऐसा नहीं होता था। अब शेष प्रश्नों को भी आश्वासन समिति में भेजा जाता है ताकि अधिकारी जवाबदेह रहें। हमारी विधानसभा में लगभग 20 समितियाँ हैं। उनकी लगातार बैठकें होती हैं। मैंने देखा कि कुछ सदस्यों की उपस्थिति कम रही, तो मैंने व्यक्तिगत पत्र लिखकर कहा कि समितियाँ महत्वपूर्ण हैं और आपको आना चाहिए। इससे उपस्थिति भी बढ़ी है। इन समितियों के जरिए ब्यूरोक्रेसी पर अंकुश लगता है और प्रशासन जवाबदेह बनता है। मेरा मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा जी और मुख्य सचिव सुधांशु पंत से इस हेतु सतत संवाद होता रहा है। सभी के सहयोग से सार्थक इसके परिणाम आ रहे हैं ।
पंजाब केसरी – विपक्ष के तेवर तो आक्रामक हैं, इस बार जैसे मुद्दों पर राजनीतिक गरमाहट है, विधानसभा में यही तल्खी आनी है, ऐसे में स्थानीय जनसमस्याओं की बात अक्सर गुम हो जाती है, कैसे सुनिश्चित करेंगे इसे ?
वासुदेव देवनानी – देखिए प्रश्नकाल इसीलिए हम बहुत फोकस्ड तरीके से करते हैं, शून्यकाल में भी मुद्दों पर अपनी बात रखने का पर्याप्त समय होता है। वैसे भी विधानसभा का परिसर मुद्दों पर सार्थक बहस,सवाल-जवाब के लिए ही होता है बशर्ते कि तय सीमा और नियमों के दायरे में हो। इसे सुनिश्चित करना मेरा काम है। बाकी तो जितनी चर्चा हो, बहस हो जनता के लिए ही हितकारी होगा। जितनी मुद्दों पर केन्द्रीत बहस होगी, उतना ही जनता को लाभ होगा।
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पंजाब केसरी – राष्ट्रीय स्तर पर जिन मुद्दों का शोर है, अक्सर सत्र उन्हीं मुद्दों के भेंट चढ़ जाते हैं। अभी एस.आई.आर, टैरिफ जैसे मुद्दें छाए हुए हैं। एसआईआर पर आपकी निजी राय ?
वासुदेव देवनानी : इस पर दो राय नहीं हो सकती। भारत में केवल भारत के नागरिकों को ही वोट देना चाहिए। अगर विदेशी नागरिक या घुसपैठिए वोट डालेंगे तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाएगा। यह सत्ता और विपक्ष दोनों की साझा ज़िम्मेदारी है कि ऐसी प्रवृत्तियों को रोकें। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे भारत की छवि कमज़ोर होती है। मेरा मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर अनर्गल आरोपों की प्रवृति को हतोत्साहित करना होगा। अन्यथा लोकतंत्र के प्रति विश्वास कैसे कायम रह पाएगा ?
पंजाब केसरी: आप छात्र राजनीति से ही आगे आए हैं। अभी छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगी हुई है,क्या सरकार को कोई सलाह देंगे ?
वासुदेव देवनानी – देखिए, इस विषय में सरकारों को ही तय करना होता है। सिद्धांतत: छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक प्रशिक्षण का मंच हैं। लेकिन इसमें केवल नारेबाज़ी नहीं, सार्थक गतिविधियाँ भी हों। छात्रों में लोकतांत्रिक संस्कार विकसित हों, यह ज़रूरी है। ये सरकार,विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संगठनों को मिलकर तय करना चाहिए कि क्या हो और कैसे हो.
पंजाब केसरी: हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने 75 पार नेताओं की राजनीति पर बयान दिया है। आप क्या सोचते हैं?
वासुदेव देवनानी: जो उन्होनें कहा था, उसका जवाब उन्हीं ने दे दिया है। अब इस पर मेरी टिप्पणी की जरूरत ही नहीं है। युवा आगे आने चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन अनुभव भी उतना ही आवश्यक है। केवल ‘युवा-युवा’ कहने से समाधान नहीं निकलेगा। स्वस्थ और सक्रिय व्यक्ति चाहे किसी भी आयु का हो, यदि जनता से जुड़ा है तो उसका योगदान मूल्यवान है। राजनीति में अनुभव और ऊर्जा का संतुलन सबसे उपयुक्त है।
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पंजाब केसरी – राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर आपकी क्या राय है, क्या इस दिशा में प्रयास हो रहे है ?
वासुदेव देवनानी – संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं, लेकिन समय के साथ और भाषाएँ जुड़नी चाहिएं। हमने विधानसभा से राजस्थानी भाषा की मान्यता का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेजा है। ये केन्द्र को ही तय करना है। मुझे लगता है कि यथोचित समय पर केन्द्र इस विषय में निर्णय लेगा। क्योंकि हमारी तरह कई अन्य स्थानों से भी भाषाओं की मान्यता की मांगें केन्द्र तक पहुंचती है। केन्द्र सरकार सभी दृष्टि से देखकर कोई निर्णय लेगी। विधानसभा से तो इस दिशा में काम हो चुका है।
पंजाब केसरी– विधान परिषद के गठन को लेकर कोई हलचल है, जनगणना और परिसीमन के बाद सीटें भी बढ़ना तय है, क्या ये सब आप सोच रहे हैं ?
वासुदेव देवनानी: देखिए, ये निर्णय केन्द्र करता है । मेरा व्यक्तिगत मत है कि विधान परिषदों में राज्य के गुणी और शिक्षित लोगों को स्थान मिले, जैसा राज्यसभा में होता है तो ठीक है, अन्यथा कई जगह नियुक्तियों में राजनीतिक कारण ज्यादा हावी हो जाते हैं। जहां तक व्यवस्थाओं की बात है, हरिशंकर भाभड़ा जी और भैरोंसिंह जी की दूरदर्शिता को मानना पड़ेगा कि मौजूदा परिसर हर संभावना के लिए पहले ही व्यवस्था कर रखी है। आने वाले वर्षों में जिस अनुपात में विधानसभा सीटें बढेंगी, उतनी व्यवस्थाएं हमारे यहां पहले से है। इसीलिए कोई समस्या नहीं है। बल्कि हम कुछ नवाचार कर रहे हैं. नीचे एक संग्रहालय बनाया है जिसमें 1952 से अब तक का राजस्थान का राजनीतिक इतिहास दर्ज है। पहले लोग सुरक्षा कारणों से नहीं आ पाते थे, लेकिन मैंने इसे जनदर्शन के लिए खोल दिया। पिछले एक साल में लगभग 20,000 लोग यहाँ आ चुके हैं। साथ ही हमने कारगिल शौर्य वाटिका, लक्षित्र वाटिका और हर्बल गार्डन भी विकसित किए हैं। हमारा प्रयास है कि विधानसभा केवल विधायकों तक सीमित न रहे बल्कि जनता के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। इसके अलावा संग्रहालय बनाया गया है जिसमें 1952 से अब तक का राजनीतिक इतिहास दर्ज है। कारगिल शौर्य वाटिका, हर्बल गार्डन और लक्षित्र वाटिका विकसित की गई हैं। विधानसभा केवल विधायकों का स्थल नहीं बल्कि जनता के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बने, यही मेरा प्रयास है।