वकीलों की हड़ताल पर हाईकोर्ट सख्त, गरीबी नहीं बन सकती आज़ादी में बाधा
Tuesday, Jan 27, 2026-06:57 PM (IST)
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले निर्णय में अधिवक्ताओं की हड़ताल पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि न्यायालयीन कार्य का बहिष्कार सीधे तौर पर विचाराधीन कैदियों और बंदियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आरोपी की गरीबी उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।
हड़ताल अस्वीकार्य, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
एकलपीठ के न्यायाधीश जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि जब अधिवक्ता न्यायिक कार्य से दूर रहते हैं, तब विशेषकर वे मामले प्रभावित होते हैं जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े होते हैं। ऐसे बहिष्कार से त्वरित न्याय का अधिकार बाधित होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश: हड़ताल का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने Ex-Capt. Harish Uppal बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2003) के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए दो टूक कहा कि वकीलों को न तो हड़ताल करने का अधिकार है और न ही सांकेतिक बहिष्कार का। ऐसी हड़तालें न्याय चाहने वाले नागरिकों को “बंधक” बना लेती हैं और पूरी न्याय व्यवस्था को ठप कर देती हैं।
संवाद से समाधान, बहिष्कार से नहीं
अदालत ने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान संवाद, बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकलता है—न कि अदालतों के कामकाज के बहिष्कार से। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि बार एसोसिएशनों की आपत्तियों पर विचार के लिए 6 जनवरी 2026 को पहले ही एक समिति गठित की जा चुकी है, जिसकी रिपोर्ट लंबित है। इसके बावजूद हड़ताल का रास्ता अपनाना अनावश्यक और अनुचित है।
कार्यशील शनिवारों पर पहले से स्पष्ट निर्देश
हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2026 की कारण सूची (Cause List) में प्रकाशित नोट का हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि कार्यशील शनिवारों को केवल पुराने लंबित मामलों की स्वैच्छिक सुनवाई होगी और उन दिनों अधिवक्ताओं की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी। इसके बावजूद हड़ताल करना न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करना है।
हड़ताल और अनुच्छेद 21
जस्टिस ढंड ने रेखांकित किया कि न्यायालयीन कार्य का बहिष्कार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रस्तावित अधिवक्ता संशोधन विधेयक, 2025 में भी वकीलों द्वारा न्यायालयीन कार्य के बहिष्कार पर रोक का प्रावधान किया गया है।
आरोपी की रिहाई में देरी—न्यायिक विफलता
यह फैसला एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषसिद्ध आरोपी राजेश कुशवाह की याचिका पर 24 जनवरी को सुनवाई के दौरान आया। आरोपी को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी और वह लगभग 7 वर्ष 11 माह की सजा काट चुका था। उसकी सजा 7 अक्टूबर 2025 को निलंबित हो चुकी थी, फिर भी वह जेल में इसलिए बंद रहा क्योंकि वह एक लाख रुपये का जुर्माना जमा करने में असमर्थ था।
गरीबी सजा का आधार नहीं बन सकती
अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि सजा निलंबन के दौरान लगाई गई शर्तें ऐसी हों, जिन्हें आरोपी अपनी आर्थिक स्थिति के कारण पूरा न कर सके, तो यह अपील के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निष्फल करने जैसा होगा। इस संदर्भ में कोर्ट ने CBI बनाम अशोक सिरपाल का हवाला देते हुए कहा कि जुर्माना जमा करने की शर्त ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसे पूरा करना असंभव हो।
विरोध का अधिकार—पर सीमाओं के साथ
हाईकोर्ट ने माना कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति व्यक्त करना मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार निरंकुश नहीं है। इसे शांतिपूर्ण, अहिंसक और न्याय प्रक्रिया को बाधित किए बिना ही प्रयोग किया जाना चाहिए।
