जयपुर में भारतीय कला की वैश्विक पहचान, कला-बाज़ार और AI पर मंथन
Sunday, Sep 20, 2026-07:36 PM (IST)
जयपुर। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC), जयपुर में रविवार को आयोजित कला संवाद “Indian Art on the Global Stage” में भारतीय कला की वैश्विक पहचान, समकालीन कला के बदलते स्वरूप, कला-बाज़ार, सौंदर्यबोध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कलाकार शैल चोयल, अखिलेश वर्मा और जयन्ती रबाड़िया ने अपने अनुभव और विचार साझा किए। संवाद का संचालन डॉ. नन्द लाल ठाकुर ने किया। चर्चा में यह प्रमुख प्रश्न सामने आया कि भारतीय कला अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता और मौलिक संवेदना को बरकरार रखते हुए वैश्विक कला-जगत में अपनी स्वतंत्र पहचान को किस तरह और मजबूत कर सकती है।
वैश्विक मंच पर भारतीय कला की पहचान पर चर्चा
संवाद की शुरुआत भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की आवश्यकता से हुई। वरिष्ठ कलाकार शैल चोयल ने भारतीय कला में मौजूद संभावनाओं का उल्लेख करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर प्रमोशन, बेहतर प्रस्तुति और संस्थागत सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि कलाकारों को ऐसे मंच उपलब्ध कराना जरूरी है, जहां उनकी रचनाएं स्थानीय और राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंच सकें। युवा कलाकारों को राष्ट्रीय और वैश्विक प्रदर्शनियों, संस्थानों तथा कला-बाज़ार से जोड़ने को भी महत्वपूर्ण बताया गया।
कला की वैश्विक भाषा पर अखिलेश वर्मा का दृष्टिकोण
अखिलेश वर्मा ने कला में सुंदरता और चित्र के अनुभव को अलग दृष्टिकोण से समझाया। उनके विचार में किसी सशक्त चित्र को देखने वाला दर्शक हर बार उसमें किसी विशेष देश, संस्कृति या राष्ट्रीय पहचान को तलाशे, यह जरूरी नहीं है।
कला का सौंदर्य और उसकी दृश्य भाषा स्वयं दर्शक के साथ संवाद स्थापित कर सकती है। कई बार किसी चित्र का अनुभव और उसकी दृश्य उपस्थिति ही अपने आप में पर्याप्त होती है।
इसी संदर्भ में भारतीय समकालीन कला के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ पर चर्चा के दौरान सुबोध गुप्ता और अनिश कपूर जैसे कलाकारों के उदाहरण भी सामने आए। इन कलाकारों के माध्यम से भारतीय अनुभव और विचार किस तरह वैश्विक कला संवाद का हिस्सा बने, इस पर चर्चा हुई।
AI और तकनीक के दौर में कलाकार की भूमिका
कार्यक्रम में Artificial Intelligence (AI) और तकनीकी बदलावों का कला-जगत पर पड़ने वाला प्रभाव भी चर्चा का प्रमुख विषय रहा।
शैल चोयल ने माना कि AI का उपयोग कला-बाज़ार और illustration तथा commercial visual work जैसे क्षेत्रों में हो सकता है। हालांकि उन्होंने कलाकार की मूल कल्पना, अनुभूति और सौंदर्यबोध के महत्व को अलग बताया।
चर्चा में यह बात सामने आई कि मशीन किसी दृश्य को उत्पन्न कर सकती है, लेकिन हाथ से बनाए गए चित्र में कलाकार का अनुभव, स्पर्श, निर्णय और मानवीय संवेदना एक अलग तरह की कलात्मक अभिव्यक्ति पैदा करते हैं।
प्रकृति के रंगों के संदर्भ में भी कलाकार के अनुभव की भूमिका पर चर्चा हुई। आकाश, पानी, पर्वत या किसी प्राकृतिक दृश्य को देखते समय कलाकार एक ही रंग में मौजूद कई सूक्ष्म छायाओं और बदलावों को अनुभव करता है। यही अनुभव किसी चित्र को महज दृश्य प्रस्तुति से आगे ले जाकर संवेदनात्मक अभिव्यक्ति में बदल सकता है।
तकनीकी बदलावों से नए अवसरों की संभावना
जयन्ती रबाड़िया ने तकनीकी बदलावों को लेकर अनावश्यक भय के बजाय उन्हें समझने और उनके साथ प्रयोग करने की जरूरत पर जोर दिया। उनके विचार के अनुसार बदलती तकनीक कलाकारों के सामने नए अवसर और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोल सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया में कलाकार की मौलिक सृजनात्मक दृष्टि और कलात्मक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण बनी रहनी चाहिए।
कला-बाज़ार और युवा कलाकारों के लिए अवसर
कार्यक्रम में कला-बाज़ार से जुड़े नीतिगत पहलुओं पर भी चर्चा हुई। शैल चोयल ने भारतीय कला की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर सहयोग और प्रोत्साहन की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कला से संबंधित कर-व्यवस्था को अधिक अनुकूल बनाने और कला क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों की जरूरत पर भी बात की। इस संदर्भ में उन्होंने चीन द्वारा कला क्षेत्र को दिए जाने वाले प्रोत्साहन का उदाहरण रखा।
विशेष रूप से युवा कलाकारों के लिए अधिक अवसर और visibility उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया गया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों तथा कला संस्थानों के साथ युवा कलाकारों की भागीदारी को भारतीय कला के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।
डॉ. नन्द लाल ठाकुर के सवालों ने बढ़ाया संवाद का दायरा
कार्यक्रम के मॉडरेटर डॉ. नन्द लाल ठाकुर ने भारतीय कला के वैश्वीकरण, कलाकार की बदलती भूमिका, कला-बाज़ार, तकनीकी बदलाव और अंतरराष्ट्रीय पहचान से जुड़े विभिन्न सवालों के माध्यम से चर्चा को व्यापक वैचारिक आयाम दिया।
उनके प्रश्नों के माध्यम से संवाद केवल कलाकारों के अनुभव साझा करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय कला के भविष्य और बदलते कला परिदृश्य पर भी विचार हुआ।
परंपरा से आगे वैश्विक संवाद की ओर भारतीय कला
“Indian Art on the Global Stage” संवाद का व्यापक निष्कर्ष यह रहा कि भारतीय कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का अर्थ केवल भारतीय प्रतीकों और परंपराओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत करना नहीं है। भारतीय कलाकार अपने अनुभव, संवेदना, कल्पना और दृष्टि के माध्यम से ऐसी दृश्य भाषा विकसित कर सकते हैं, जो सांस्कृतिक सीमाओं से परे दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करे।
तकनीक, डिजिटल माध्यम और कला-बाज़ार के लगातार बदलते दौर में कलाकार के लिए अपनी मौलिक कल्पना और सौंदर्यबोध को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। माध्यम और तकनीक बदल सकते हैं, लेकिन कला के केंद्र में मौजूद मानवीय अनुभव और सृजनात्मक दृष्टि की भूमिका बनी रहती है।
जयपुर के राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित यह संवाद भारतीय कला की वर्तमान स्थिति के साथ-साथ उसके वैश्विक भविष्य की संभावनाओं पर विचार का महत्वपूर्ण मंच बना।
