राजस्थानमें ई-मेल टेटर बना सिरदर्द, डिजिटल भूत दे रहे धमकी

Friday, Apr 24, 2026-05:25 PM (IST)

जयपुर। राजस्थान में कुछ ऐसा हो रहा है जो एबनॉर्मल है. वैसे तो पूरे भारत में स्कूल, अदालत और संस्थानों में बम धमाकों के फर्जी मेल मिलते हैं लेकिन राजस्थान में इन दिनों कुछ ज्यादा हीहो रहा है. क्या ये कोई पैटर्न हैं या फिर कोई सिर्फ अपनी मसखरी के लिए प्रशासन और सरकार के होश फाख्ता कर रहा है. आगे बढ़ें, इससे पहले आपको बताते हैं कि राजस्थानमें बम धमाकों की धमकी का पैटर्न क्या है. राजस्थानमें फर्जी बम धमकी वाले ईमेल का सिलसिला 2025 के आखिर से तेजी से बढ़ा है और 2026 में भी लगातार जारी है। ज्यादातर मामले स्कूलों, हाईकोर्ट, सेशन कोर्ट, पासपोर्ट कार्यालय, डाकघरों, विधानसभाऔर कलेक्ट्रेट को निशाना बनाते हैं। 

 

हालांकि सभी मामले फर्जी (hoax) साबित हुए हैं, लेकिन इनसे प्रशासन, पुलिस और आम जनता में भारी दहशत फैलती है। 2025 में पूरे राजस्थान में 57 फर्जी बम धमकी ईमेल मिले। इन धमकियों की वजह से जयपुर, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू के बाद देश के धमकी वाले मेल की सूची में टॉप-5 शहरों में शामिल हो गया. अकेले जयपुर में अकेले 61 मामले दर्ज हुए जिनमें 29 मामले स्कूल में धमाकों के, सात मामले स्टेडियम उड़ाने के हैं और चार धमकियां एयरपोर्ट उड़ाने की हैं और 11 धमकियां कोर्ट और कलेक्ट्रेट उड़ाने की हैं. वहीं 2026 में फरवरी से अप्रैल तक कई बार फरवरी से अप्रैल तक कई बार हाईकोर्ट, कोर्ट परिसर, पासपोर्ट-डाकघर और विधानसभा पर हमले हुए। अभी तक सैकड़ों घंटे पुलिस-बम स्क्वॉड की मेहनत बर्बाद हुई है।

 

31 अक्टूबर 2025 में राजस्थान हाईकोर्टकी जयपुर बैंच को धमकी का पहला मेल आया. 5 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट को उड़ाने कीदूसरी धमकी आई. फिर 8,9,10 और 11 दिसंबर को लगातार चार दिन में हाईकोर्ट के लिए फिर धमकियां आई. सब में एक जैसा पैटर्न विधानसभा, स्कूल, कोर्ट, एयरपोर्ट, अस्पताल को उड़ा दिया जाएगा. जाहिर है बम धमाके और आतंकी वारदातें हो चुकी हैं तो जयपुर मेंइन धमकियों को बहुत गंभीरता से लेना ज़रूरी है. लेकिन होता क्या है, क्यों नहीं पकड़े जाते मेल टेटर अटैक करने वाले अपराधी...? 

 

चलिए शुरु से शुरु करते हैं और बात करते हैं असल मुद्दे की...क्योंकि ये होती तो सिर्फ धमकी है लेकिन न जाने कब हकीकत में बदल जाए...सियार आया, सियार आया वाली कहानी तो आपको मालूम ही होगी, जिसमें रोज सियार आने का शोर मचाने वाले के पास जब असल में सियार आ गया तो उसके शोर मचाने का लोगों पर कोई फर्क ही नहीं पड़ा, क्योंकि लगा कि रोज की तरह फिर बेवजह चिल्ला रहा है...एक सवाल कि कानून तोड़ने वाले और ख़ासकर आतंकी हमले की धमकी देना क्या इतना आसान है? अगर ट्रेडिशनल तरीके से ऐसा करे तो लेने के देने पड़ जाएं. क्यों आखिर इन साइबर धमकीबाजों को कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता, या यूं कहें कि इनमें डर क्यों नही हैं. हर मामले में जांच करती पुलिस साइबर ट्रेसिंग करती है. लेकिन ज्यादातर मामलों में VPN टोर के कारण सारी ट्रेल विदेशी सर्वर पर जाकरख़त्म हो जाती है.

 

ये मुद्दा सिर्फ़ राजस्थान का नहीं, पूरे भारत में इसी तरहफर्जी मेल में बम धमाकों करने की धमकी सुर्खियों में रहती है. आखिर ये ये “डिजिटलभूत” कैसे खेल जाते हैं अपना डरावना खेल? असल में इन लोगों के पास असल बम से भी बड़ी ताकत है गुमनामी...ये जानते हैं कि भारतमें इन्हें ट्रेस नहीं किया जा सकता. इसीलिए ऐसी तकनीकी चालें चलते हैं कि ट्रेसिंग लगभग नामुमकिन बन जाती है. दरअसल, साइबर विशेषज्ञ और पुलिस अधिकारी बार-बार एक ही टूलकिट का जिक्र करते हैं. VPN, प्रॉक्सी और टोर नेटवर्क ऐसा होता है कि भेजने वाला अपना कनेक्शन कई एन्क्रिप्टेड सर्वर से गुजारता है। पुलिस को दिखने वाला आईपी अक्सर अमेरिका, बांग्लादेश, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रियाया जर्मनी जैसा देश दिखाता है। कई लोग “VPN चेन” इस्तेमाल करते हैं यानि सिग्नल को कई नो-लॉग पॉलिसी वाले सर्वर से घुमाकर इस्तेमाल किया जाता है. 

 

इसके अलावा डार्क वेब और अनाम ईमेल सेवाएं भी इंटरनेट की दुनिया में मौजूद हैं. डार्क वेब पर उपलब्ध टूल्स सेएक बार इस्तेमाल होने वाले ईमेल आईडी बनाए जाते हैं। कुछ आरोपी सैकड़ों जाली जीमेल आईडी बनाकर अपना खेल करते हैं. अब असल मुद्दा यह है कि पुलिस,प्रशासन विदेशी सर्वरट्रेक भी कर ले तो भी करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं हैं. ईमेल का मूल ट्रेस करने तक आसान काम हैं लेकिन इससे आगे ट्रेल विदेशी सर्वर पर खत्म हो जाता है। वहाँ भारतीय एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग चाहिए, जोअक्सर देर से या बिल्कुल नहीं मिलता. नो-लॉग VPN औरटोर रीयल-टाइम ट्रेसिंग को बेहद मुश्किल बना देते हैं. समय पर पुलिस का एक्शन औरजांच हो भी जाए लेकिन असली आतंकी खतरों की तुलना में ये मामले कम प्राथमिकता वालेहोते हैं, इसलिए संसाधन कम पड़ जाते हैं. 

 

देश में लगातार इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एसओपी की मांग उठ रही है. क्योंकि अलग-अलग राज्यों में  हर मामले की अंतर्राष्ट्रीय जांच संभव नहीं. लेकिन एकीकृत रूप से सारी जानकारियों को इकठ्ठा करना और एक जैसा एक्शन करना, लोगों में पैनिक कंट्रोल के लिए भी कारगर होगा और अपराधियों तक पहुंचने की राह इसी के आधार पर बनेगी...कानून, प्रशासन और सरकारें अपना काम करेंगी लेकिन हमारी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं..बतौर व्यक्ति, बतौर संस्थान...मसलन, संस्थान हर ईमेल को 100% सच्चा मानकर पूरा रिस्पॉन्स ट्रिगर कर देते हैं, जो ठीक होक्स भेजने वाले की चाहत होती है। थ्रेट असेसमेंट पर फोकस करना चाहिए. इसके लिए ट्रेनिंग मॉड्यूल बनाने की जरूरतहै. मजबूत ईमेल प्रमाणीकरण (SPF, DKIM, DMARC), AI आधारित थ्रेट डिटेक्शन और डार्क वेब मार्केटप्लेस की बेहतर निगरानीके साथ जन जागरूकता से ऐसे डिजिटल भूतों से और उनकी मंशा से निपटने में कामयाबी मिल सकती है.


Content Editor

Anil Jangid

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