डूंगरपुर में 63 साल से जीवंत है श्रीमाल समाज की गरबा परंपरा, नगाड़ों-ताशों की थाप पर होता है डांडिया रास
Monday, Oct 19, 2026-01:39 PM (IST)
डूंगरपुर। राजस्थान के डूंगरपुर जिले के सोनिया चौक पर श्रीमाल समाज की 63 साल पुरानी गरबा परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। वर्ष 1963 में शुरू हुई इस परंपरा में नवरात्रि के दौरान नगाड़ों और ताशों की थाप पर पारंपरिक गरबे गाए जाते हैं। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में डांडिया रास कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। यह आयोजन धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और वागड़ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुका है।
पुत्र के स्वास्थ्य लाभ की कामना से हुई थी गरबा परंपरा की शुरुआत
समाजजनों के अनुसार, सोनिया चौक पर श्रीमाल समाज की गरबा परंपरा की शुरुआत वर्ष 1963 में स्वर्गीय सूरज देवी, पत्नी स्वर्गीय कचरूलालजी श्रीमाल ने अपने पुत्र के स्वास्थ्य लाभ की कामना से की थी। उन्होंने अपने निवास पर नौ दिवसीय गरबा आयोजन शुरू किया। इसके बाद स्वर्गीय कन्हैयालाल उदयलालजी ने इस आयोजन को सोनिया चौक तक विस्तार दिया। उनके द्वारा रचे गए पारंपरिक गरबे आज भी नवरात्रि के दौरान गाए जाते हैं।
हर दिन अलग रंग की वेशभूषा, पंचमी और अष्टमी पर विशेष डांडिया रास
श्रीमाल समाज के इस आयोजन में नवरात्रि के प्रत्येक दिन महिलाओं के लिए अलग-अलग रंग की वेशभूषा निर्धारित रहती है। इससे आयोजन में पारंपरिक रंगों और सांस्कृतिक अनुशासन की विशेष झलक देखने को मिलती है।
पंचमी और अष्टमी के दिन विशेष उत्साह के साथ डांडिया रास का आयोजन होता है। इन अवसरों पर महिलाएं सिर पर तेल के दीपक रखकर गरबा करती हैं। वहीं, पुरुष पारंपरिक गरबों का गायन करते हुए नगाड़े और ताशे बजाते हैं। यह अनूठी परंपरा आयोजन को विशिष्ट पहचान देती है।
लॉटरी से तय होता है पूजा और आरती का अवसर
सोनिया चौक पर गरबा आयोजन की एक खास परंपरा पूजा और आरती से भी जुड़ी है। यहां पूजा-अर्चना और आरती का अवसर परिवारों को लॉटरी के माध्यम से दिया जाता है। एक बार जिस परिवार को यह अवसर मिल जाता है, उसका नाम 19 वर्ष बाद दोबारा लॉटरी में शामिल किया जाता है।
पंचमी, अष्टमी और दशमी के दिन विशेष महाआरती आयोजित होती है। इन अवसरों पर समाज के लोग एकत्र होकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं और माता की आराधना करते हैं।
नई पीढ़ी भी संभाल रही सांस्कृतिक विरासत की जिम्मेदारी
समय के साथ सोनिया चौक के पारंपरिक गरबे डूंगरपुर से निकलकर पूरे वागड़ क्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुके हैं। आधुनिकता के दौर में भी समाज के लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं को सहेजकर रखा है। खास बात यह है कि समाज की नई पीढ़ी भी इस आयोजन में उत्साहपूर्वक भाग लेकर विरासत को आगे बढ़ा रही है।
श्रीमाल समाज की यह 63 साल पुरानी गरबा परंपरा बताती है कि सामूहिक प्रयास, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखा जा सकता है। सोनिया चौक का यह आयोजन आज भी डूंगरपुर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता की प्रेरणादायी मिसाल है।
