72 घंटे में 20 लाख सदस्य, एक करोड़ पार फोलोवर्स! आखिर क्या चाहता है कोकरोच?

Thursday, May 21, 2026-06:09 PM (IST)

विशाल सूर्यकांत शर्मा—

दाग़ देहलवी लिख गए थे—
“तुझे तो वादा-ए-दीदार हमसे करना था,
ये क्या कि सारे जहां को उम्मीदवार किया…”

लेकिन जनाब, सोशल मीडिया के इस दौर में तो हालात कुछ यूँ हैं कि अब हर हाथ में मोबाइल है और हर मोबाइल में एक उम्मीदवार पल रहा है। कोई नौकरी का उम्मीदवार, कोई सिस्टम बदलने का उम्मीदवार, कोई क्रांति का उम्मीदवार… और अब तो हाल ये है कि कोकरोच भी उम्मीदवार हो गया है। जी हाँ, वही कोकरोच… जिसे देखकर घरों में चप्पलें उठती थीं, अब वही इंस्टाग्राम की रीलों में क्रांति का प्रतीक बन बैठा है। न कोई चुनाव आयोग की मान्यता, न झंडा, न दफ्तर, न स्टार प्रचारक, फिर भी 72 घंटों में लाखों सदस्य। फॉलोअर्स ऐसे बढ़े जैसे बरसात में नालियों से निकलते कोकरोच। व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन यह ट्रेंड केवल मज़ाक नहीं है।

 

यह उस पीढ़ी की बेचैनी है जिसे हर परीक्षा से पहले पेपर लीक का डर है, हर डिग्री के बाद बेरोज़गारी का इंतज़ार है और हर भाषण के बाद यह एहसास कि उसकी बारी अभी भी अगली योजना में है। सोशल मीडिया ने इस गुस्से को मीम में बदला, मीम ने आंदोलन का रूप लिया और आंदोलन ने सत्ता से लेकर विपक्ष तक सबकी नींद उड़ा दी। कमाल देखिए, जिन आईटी सेल्स ने सालों तक जनता को कंटेंट परोसा, अब जनता उन्हीं की भाषा में जवाब दे रही है।

 

रील बनाम रील। ट्रेंड बनाम ट्रेंड. नैरेटिव बनाम नैरेटिव। लेकिन यहीं सबसे बड़ा खतरा भी छिपा है। डिजिटल भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता, इसलिए उसकी कोई जवाबदेही भी नहीं होती।
आज यह भ्रष्टाचार के खिलाफ मीम बना रही है, कल यही भीड़ किसी अफवाह को सत्य घोषित कर सकती है। कम्युनिकेशन की वही पुरानी “बुलेट थ्योरी को अगर नहीं जानते हैं तो इसी इंटरनेट पर पढ़ लीजिएगा जिसमें कोई सूचना गोली की तरह निकलती है और दिमागों को भेद देती है, चाहे सच हो या आधा सच। किसने क्या कहा, किस संदर्भ में कहा, क्यों कहा — इसकी पड़ताल अब ट्रेंडिंग टैब नहीं करता। वहाँ केवल वायरलिटी का संविधान चलता है। 

 

दोस्तों, अन्ना आंदोलन भी एक उफान था। नेपाल और बांग्लादेश में भी युवाओं का उबाल सोशल मीडिया से निकला था। हर क्रांति शुरुआत में रोमांच पैदा करती है, लेकिन इतिहास गवाह है कि क्रांति के बाद की अव्यवस्था अक्सर समाज को थका देती है। इसलिए “कोकरोच पार्टी” को केवल हंसी में उड़ाना भूल होगी। यह मीम नहीं, संकेत है। यह बताता है कि युवा अब भाषण नहीं, भागीदारी चाहता है। उसे विकास का विज्ञापन नहीं, व्यवस्था में विश्वास चाहिए। सरकार के लिए यह चेतावनी है कि केवल इवेंट मैनेजमेंट से जनमत नहीं चलता। युवा रोजगार मांग रहा है, पारदर्शिता मांग रहा है, परीक्षा व्यवस्था में ईमानदारी मांग रहा है।  अगर उसकी बात नहीं सुनी गई, तो वह व्यंग्य को ही हथियार बना लेगा...। दोस्तों, व्यंग्य सबसे खतरनाक विपक्ष होता है।

 

लेकिन इसमें विपक्ष के लिए भी सबक कम नहीं। अगर जनता मीम पेजों में उम्मीद खोज रही है, तो इसका अर्थ है कि पारंपरिक विपक्ष अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। मीम्स के इनिशिएटिव्स से पार्टियां सरकारो को घेरने का मौका बनाने लगें, तो उनकी जमीनी ताकत का भी अंदाजा हो ही जाता है. विरोध करना लाजमी है लेकिन विकल्प क्या दोगे, ये भी सोचना पड़ता है. युवाओं को ये बात समझानी है कि सोशल मीडिया में ट्रेंडिंग का उत्साह ज़रूरी है, लेकिन उन्माद न बदले तो बेहतर है. डिजिटल क्रांति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसका स्टीयरिंग अक्सर किसी के हाथ में नहीं होता। जो ट्रेंड मज़ाक में शुरू होता है, वह भीड़ की मानसिकता में बदलते देर नहीं लगाता।

 

देश को भ्रष्टाचार-मुक्त, व्यवस्थित और जवाबदेह व्यवस्था चाहिए, अराजकता नहीं। व्यवस्था से असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन व्यवस्था को ही मज़ाक बना देना अंततः समाज को खोखला करता है। बाकी, फिलहाल तो इंटरनेट पर कोकरोच दौड़ रहे हैं। मीम बनाइए, हँसिए, सरकार को सुनाइए, विपक्ष को चुभाइए, लेकिन इतना याद रखिए कि हर वायरल चीज़ क्रांति नहीं होती, कुछ ट्रेंड्स की उम्र सचमुच कोकरोच से भी कम होती है।


Content Editor

Anil Jangid

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