प्रतापगढ़ में मां काली की पूजा के साथ अफीम की चिराई शुरू

Thursday, Feb 19, 2026-03:09 PM (IST)

प्रतापगढ़। प्रतापगढ़ जिले में काले सोने के नाम से प्रसिद्ध अफीम की फसल इन दिनों यौवन पर है। डोडों के पकते ही किसानों ने शुभ मुहूर्त में मां काली की पूजा-अर्चना कर चिराई (चीरा लगाने) और दूध संग्रहण का कार्य शुरू कर दिया है। खेतों में झोपड़ियां बन चुकी हैं, रात-दिन रखवाली की जा रही है और हर सुबह डोडों से टपकता दूध किसानों की उम्मीदों को नया आकार दे रहा है।

 

जिले के ग्रामीण अंचलों में यह दृश्य अब आम हो गया है। किसानों ने परंपरा के अनुसार नवदुर्गा की स्थापना के साथ खेत में पूजा का आयोजन किया। शुभ दिशा में माता को रोली बांधी गई, घी-तेल के दीपक जलाए गए, अगरबत्ती और नारियल चढ़ाए गए। इसके बाद पांच पौधों पर रोली बांधकर डोडों पर पहला चीरा लगाया गया और अंत में गुड़, धनिया और नारियल का प्रसाद बांटकर कार्य की विधिवत शुरुआत की गई।

 

काले सोने की फसल की सुरक्षा के लिए किसानों ने खेतों में अस्थायी झोपड़ियां भी बना ली हैं। दिन में चिराई और दूध संग्रहण, रात में चौकसी—यह दिनचर्या अब सामान्य हो गई है। डोडों से निकलने वाला दूध रोज एकत्र कर सरकार को जमा कराया जाएगा। किसानों का मानना है कि पूजा-पाठ और पारंपरिक टोटके फसल पर बुरी नजर से बचाते हैं। बच्चे भी खेतों में हाथ बंटाने लगे हैं।

 

नारकोटिक्स विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 में जिले के 9,641 किसानों को लाइसेंस जारी किए गए हैं। इसमें 7,351 किसान चीरा पद्धति और 2,390 किसान सीपीएस पद्धति से अफीम उत्पादन कर रहे हैं। प्रतापगढ़ खंड में 3,827 चीरा पद्धति, 1,664 सीपीएस और कुल 5,491 लाइसेंस हैं। छोटीसादड़ी खंड में 3,524 चीरा पद्धति, 626 सीपीएस और कुल 4,150 लाइसेंस हैं।

 

अफीम की यह फसल केवल आर्थिक संबल ही नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और अनुशासन का प्रतीक भी है। डोडों पर पड़ने वाला हर चीरा केवल दूध नहीं, बल्कि उम्मीद और समृद्धि का प्रतीक बनकर किसानों के खेतों से निकल रहा है।


Content Editor

Anil Jangid

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