झालावाड़ उपभोक्ता कोर्ट में नया मोड़: ऋतिक रोशन के वकालतनामों पर उठे सवाल, फर्जी बताकर खारिज करने की मांग!

Saturday, Apr 11, 2026-02:57 PM (IST)

राजस्थान के झालावाड़ में उपभोक्ता कोर्ट में चल रहे एक चर्चित मामले ने नया मोड़ ले लिया है। बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन और एक शीतल पेय कंपनी से जुड़े भ्रामक विज्ञापन मामले में अब कोर्ट में पेश किए गए वकालतनामों की वैधता पर सवाल उठ गए हैं।

मामले में परिवादी पक्ष के वकील गुरुचरण सिंह ने कोर्ट में प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया है कि प्रतिवादी पक्ष की ओर से पेश किए गए वकालतनामे फर्जी और अधिमान्य (invalid) हैं। उन्होंने कोर्ट से इन दस्तावेजों को अस्वीकार करने की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला भ्रामक विज्ञापन से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि एक शीतल पेय कंपनी और उसके ब्रांड एंबेसडर के रूप में ऋतिक रोशन ने ऐसे दावे किए, जो वास्तविकता से परे हैं।

इस मामले में उपभोक्ता कोर्ट झालावाड़ ने 12 फरवरी को अभिनेता और कंपनी को नोटिस जारी किए थे। इसके जवाब में 12 मार्च को तीन स्थानीय अधिवक्ताओं द्वारा कोर्ट में जवाब पेश किया गया।

वकालतनामों में क्या हैं खामियां?

परिवादी वकील गुरुचरण सिंह ने इन जवाबों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पेश किए गए वकालतनामों में कई गंभीर त्रुटियां हैं—

  • वकालतनामे पर 8 अधिवक्ताओं के नाम दर्ज हैं, लेकिन हस्ताक्षर केवल 4 के ही हैं
  • कुछ दस्तावेजों में रजिस्ट्रेशन नंबर, स्थान और तारीख जैसी आवश्यक जानकारी नहीं है
  • दस्तावेजों की वैधता संदिग्ध प्रतीत होती है

इन आधारों पर उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि इन वकालतनामों को अस्वीकार किया जाए और प्रतिवादी पक्ष को नए, वैध दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने के निर्देश दिए जाएं।

भ्रामक विज्ञापन का आरोप

गुरुचरण सिंह ने अपने परिवाद में यह भी आरोप लगाया है कि विज्ञापन में यह दावा किया गया कि उक्त कोल्ड ड्रिंक पीने से शरीर में अत्यधिक ऊर्जा और स्फूर्ति आती है, जिससे व्यक्ति असाधारण कार्य कर सकता है।

उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं इस उत्पाद का उपयोग किया, लेकिन उन्हें ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ। उनके अनुसार, यह विज्ञापन आम उपभोक्ताओं को गुमराह करता है।

कानूनी पहलू

परिवादी पक्ष का कहना है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत किसी भी उत्पाद के बारे में गलत या भ्रामक जानकारी देना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।

इसी आधार पर उन्होंने न केवल मामले में कार्रवाई की मांग की है, बल्कि अंतिम निर्णय आने तक इस विज्ञापन पर रोक लगाने की भी अपील की है।

आगे क्या?

फिलहाल कोर्ट इन वकालतनामों की वैधता पर विचार कर रहा है। यदि अदालत इन्हें अमान्य घोषित करती है, तो प्रतिवादी पक्ष को नए दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।

यह मामला अब केवल भ्रामक विज्ञापन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजों की वैधता पर भी केंद्रित हो गया है।

निष्कर्ष

झालावाड़ उपभोक्ता कोर्ट में चल रहा यह मामला उपभोक्ता अधिकारों और विज्ञापनों की सच्चाई को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। आने वाले दिनों में कोर्ट का फैसला न केवल इस केस के लिए, बल्कि भविष्य के विज्ञापन मामलों के लिए भी दिशा तय कर सकता है।


Content Editor

Payal Choudhary

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