उदयपुर में 459 साल पुरानी रंग तेरस की परंपरा: पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नहीं बदला आस्था का रंग
Thursday, Mar 19, 2026-05:48 PM (IST)
459 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
उदयपुर के वल्लभनगर उपखंड के रुण्डेड़ा गांव में रंग तेरस की परंपरा पिछले करीब 459 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है। बदलते समय और पीढ़ियों के बावजूद इस परंपरा की आस्था और उत्साह आज भी वैसा ही बना हुआ है।
यह आयोजन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि गांव की पहचान और एकता का प्रतीक है, जिसे ग्रामीण अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में संजोए हुए हैं।
धूणी से शुरू होकर मंदिरों तक पहुंचता जुलूस
रंग तेरस की शुरुआत गांव की उत्तर दिशा में स्थित महात्मा जत्तीजी की धूणी से होती है। ग्रामीण ढोल-मादल और थाली के साथ यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं।
इसके बाद जुलूस डेमण्ड बावजी के स्थान की ओर बढ़ता है, जहां आशीर्वाद लेने के बाद सभी लोग बड़े मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यहां भांग लेने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
गैर और घूमर नृत्य से सजती है परंपरा
इस आयोजन के दौरान ग्रामीण जत्तीजी की अमानत माला, चिमटा और घोड़ी के साथ पारंपरिक गैर नृत्य करते हैं। ढोल-मादल की थाप पर पूरे गांव में उत्साह का माहौल बन जाता है।
रात के समय इस परंपरा की रौनक और बढ़ जाती है, जब पुरुष गैर नृत्य करते हैं और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में घूमर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। यह दृश्य मेवाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति की झलक पेश करता है।
कई धार्मिक स्थलों से गुजरता है जुलूस
रंग तेरस का जुलूस गांव के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों से होकर गुजरता है, जिनमें:
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तलहटी मंदिर
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निमड़िया बावजी
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जुना मंदिर
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लक्ष्मीनारायण मंदिर
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महादेव मंदिर
इस दौरान गांव के लोग एक साथ चलकर अपनी परंपराओं को जीवित रखते हैं और सामाजिक एकता का संदेश देते हैं।
नेजा रस्म का विशेष महत्व
इस परंपरा का एक खास हिस्सा नेजा रस्म है। इसमें महिलाएं आक की हरी टहनियां लेकर कतार में खड़ी होती हैं और पुरुष उनके बीच से गुजरते हैं।
मान्यता है कि इस रस्म को निभाने से व्यक्ति पूरे साल स्वस्थ और सुरक्षित रहता है। यह परंपरा आस्था और लोक मान्यताओं का अनूठा संगम है।
सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं ग्रामीण
रुण्डेड़ा गांव के लिए रंग तेरस केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उनकी पहचान और संस्कृति का हिस्सा है। ग्रामीण इसे अपने पूर्वजों की धरोहर मानते हुए पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।
करीब 459 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा मेवाड़ की लोक संस्कृति को जीवित रखने का एक सशक्त उदाहरण है।
