सीकर के छोरे का कमाल: 12वीं पास कमलेश शर्मा ने खड़ा किया 2 करोड़ का ब्रांड, ए.आर. रहमान भी हुए कायल
Thursday, Jan 08, 2026-05:53 PM (IST)
सीकर। कहते हैं कि अगर इंसान के हौसले बुलंद हों और मेहनत में कोई कमी न हो, तो सीमित साधन भी बड़ी सफलता की राह नहीं रोक सकते। इस कहावत को सच कर दिखाया है राजस्थान के सीकर जिले के छोटे से गांव पुरां बड़ी निवासी कमलेश शर्मा ने। महज 12वीं तक पढ़े-लिखे कमलेश ने 25 साल की उम्र में वाद्ययंत्र निर्माण के क्षेत्र में ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है, जिसकी आज वैल्युएशन करीब 5 करोड़ रुपये आंकी जा रही है, जबकि चालू वित्त वर्ष में उनका टर्नओवर 2 करोड़ रुपये तक पहुंचने वाला है।
कमलेश शर्मा की सफलता की कहानी साल 2021 से शुरू होती है। कोरोना काल के दौरान जब हालात चुनौतीपूर्ण थे, तब वे सूरत से अपने गांव लौट आए। इसी दौरान उन्होंने अपने पिता लालचंद शर्मा और भाई कृष्णा शर्मा के साथ मिलकर ‘द कमलेश’ (The Kamlesh) नाम से एक ब्रांड की नींव रखी। शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ हुई। मात्र 5 से 7 लाख रुपये के निवेश से उन्होंने भारतीय पारंपरिक वाद्ययंत्र ‘इंडियन बैंजो’ की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित की।
कमलेश ने शुरू से ही गुणवत्ता और ध्वनि की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया। यही कारण रहा कि उनके बनाए वाद्ययंत्र धीरे-धीरे संगीत प्रेमियों और पेशेवर कलाकारों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने लगे। मेहनत और लगन का नतीजा यह रहा कि कुछ ही वर्षों में उनका ब्रांड देश-विदेश में लोकप्रिय हो गया।
18 देशों तक पहुंच, ए.आर. रहमान ने भी बजाया बैंजो
आज सीकर की मिट्टी में बने कमलेश के वाद्ययंत्र केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा सहित दुनिया के 18 से अधिक देशों में उनके इंडियन बैंजो एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं। उनके बैंजो की कीमत 8 हजार रुपये से शुरू होकर 35 हजार रुपये तक जाती है।
कमलेश के करियर का सबसे गौरवपूर्ण पल तब आया, जब ऑस्कर विजेता और विश्व प्रसिद्ध संगीतकार ए.आर. रहमान ने उनके बनाए वाद्ययंत्रों का उपयोग किया। यह उपलब्धि न सिर्फ कमलेश के लिए, बल्कि पूरे सीकर जिले और राजस्थान के लिए गर्व का विषय बनी।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिली पहचान, बड़े सपने
कमलेश की सफलता में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भी बड़ी भूमिका रही है। वे साल 2016 से यूट्यूब पर वाद्ययंत्र बजाना सिखा रहे हैं और आज उनके चैनल पर 7 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं। इसी डिजिटल पहचान ने उन्हें ग्लोबल ब्रांड बनाने में मदद की।
हाल ही में कमलेश ने ‘हंसमाला’ नाम से एक नया ब्रांड भी लॉन्च किया है। भविष्य में वे हारमोनियम, ढोलक और अन्य पारंपरिक भारतीय वाद्ययंत्रों के बड़े स्तर पर निर्माण की योजना बना रहे हैं।
कमलेश शर्मा की यह कहानी आज के युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो यह साबित करती है कि गांव की गलियों से निकलकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का सफल ब्रांड खड़ा किया जा सकता है—बस जरूरत है मजबूत इरादों और निरंतर मेहनत की।
