रणथंभौर की बाघिन T-39 (नूर) अंतिम पड़ाव में, शांत इलाकों की ओर बढ़ी | Forest Department Alert

Thursday, Apr 23, 2026-01:56 PM (IST)

राजस्थान के रणथंभौर नेशनल पार्क से एक बड़ी और भावुक खबर सामने आई है। पार्क की चर्चित बाघिन T-39 (नूर) अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुकी है और लगातार जंगल के बाहरी, शांत इलाकों की ओर बढ़ रही है।

18 साल की उम्र, एक मिसाल
करीब 18 साल की उम्र में T-39 रणथंभौर की सबसे अधिक उम्र तक जीवित रहने वाली बाघिनों में शामिल हो गई है। आमतौर पर जंगली बाघों का जीवनकाल सीमित होता है, लेकिन T-39 ने बिना किसी चिकित्सा सहायता या मानवीय हस्तक्षेप के लंबा जीवन जीकर एक अलग मिसाल कायम की है।

तीन बार बनी मां, नई पीढ़ी को दिया जीवन
अपने जीवनकाल में T-39 तीन बार मां बनी। उसके शावकों ने रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की नई पीढ़ी को मजबूत किया। इस तरह उसने न सिर्फ खुद जीवित रहकर बल्कि अपनी संतानों के जरिए भी जंगल के संतुलन में अहम भूमिका निभाई।

T-39 की तुलना अक्सर मशहूर मछली टाइगर से की जाती है, लेकिन उसकी खासियत यह है कि उसने पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवन बिताया। बिना किसी विशेष संरक्षण या हस्तक्षेप के इतने लंबे समय तक जीवित रहना उसे खास बनाता है।

व्यवहार में बदलाव: संकेत और चिंता
वन विभाग के अनुसार हाल के दिनों में T-39 के व्यवहार में बदलाव देखा गया है। वह अब कोर एरिया छोड़कर बाहरी और शांत इलाकों में अधिक समय बिता रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ यह बदलाव स्वाभाविक होता है, क्योंकि बाघ कम प्रतिस्पर्धा वाले क्षेत्रों की तलाश करने लगते हैं।

वन विभाग अलर्ट मोड में
T-39 की गतिविधियों पर वन विभाग लगातार नजर बनाए हुए है। DFO मानस सिंह और उनकी टीम पूरी सतर्कता के साथ मॉनिटरिंग कर रही है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रकार का मानव-वन्यजीव संघर्ष न हो और बाघिन सुरक्षित रहे।

एक जीवित विरासत
आज T-39 सिर्फ एक बाघिन नहीं, बल्कि साहस, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ संतुलन की जीवंत मिसाल बन चुकी है। रणथंभौर के लिए वह एक ऐसी विरासत है, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।


Content Editor

Kuldeep Kundara

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