विश्वेंद्र सिंह ने कांग्रेस को क्यों कहा अलविदा? डोटासरा से टकराव, भरतपुर का सियासी समीकरण और आगे की राह
Friday, Oct 02, 2026-03:49 PM (IST)
भरतपुर/जयपुर। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर भरतपुर चर्चा के केंद्र में है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और भरतपुर के पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखने वाले विश्वेंद्र सिंह ने 2 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कांग्रेस से अलग होने का ऐलान किया। अपने पोस्ट में उन्होंने स्वाभिमान और पार्टी के भीतर की परिस्थितियों को लेकर नाराजगी जाहिर की। यह घटनाक्रम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के साथ उनके बढ़ते मतभेदों के बीच सामने आया है।
हालांकि, इस्तीफे की औपचारिक प्रक्रिया को लेकर दिनभर अलग-अलग रिपोर्ट सामने आईं। कुछ रिपोर्टों में इसे कांग्रेस से इस्तीफा बताया गया, जबकि बाद की एक रिपोर्ट में विश्वेंद्र सिंह के हवाले से कहा गया कि उन्होंने औपचारिक इस्तीफा नहीं दिया है। ऐसे में उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है।
राजघराने से राजनीति तक का सफर
विश्वेंद्र सिंह भरतपुर के अंतिम शासक महाराजा बृजेन्द्र सिंह के पुत्र हैं। उनका राजनीतिक सफर किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं रहा। 1988 में वे भरतपुर के जिला प्रमुख बने और इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़कर जनता दल का दामन थामा।
1989 में जनता दल के टिकट पर उन्होंने भरतपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीता और पहली बार संसद पहुंचे। उस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता राजेश पायलट को हराया था।
इसके बाद उनका राजनीतिक सफर बीजेपी तक पहुंचा। 1999 और 2004 में वे बीजेपी के टिकट पर भरतपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। 2008 में उन्होंने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में वापसी की।
यानी विश्वेंद्र सिंह का राजनीतिक सफर कांग्रेस से जनता दल, जनता दल से बीजेपी और फिर बीजेपी से कांग्रेस तक पहुंचा। यही वजह है कि उनके हर राजनीतिक फैसले को भरतपुर के स्थानीय समीकरणों से जोड़कर देखा जाता रहा है।
गहलोत सरकार में मंत्री बने, फिर मानेसर पहुंचे
2013 और 2018 में विश्वेंद्र सिंह डीग-कुम्हेर से कांग्रेस के विधायक चुने गए। 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन्हें कैबिनेट में जगह दी। उनके पास पर्यटन समेत महत्वपूर्ण विभाग रहे।
लेकिन 2020 में राजस्थान कांग्रेस के भीतर सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच राजनीतिक टकराव ने पूरी तस्वीर बदल दी।
विश्वेंद्र सिंह पायलट खेमे के साथ मानेसर चले गए। उस समय वे गहलोत सरकार में मंत्री थे। इसके बाद उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया और कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से भी निलंबित किया गया।
हालांकि राजनीतिक कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। बाद में पायलट खेमे की वापसी के बाद विश्वेंद्र सिंह को फिर गहलोत सरकार में मंत्री बनाया गया। नवंबर 2021 में उन्हें पर्यटन और नागरिक उड्डयन विभाग की जिम्मेदारी दी गई।
यानी कुछ समय पहले जिस नेता ने गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत में पायलट का साथ दिया था, वही बाद में दोबारा गहलोत सरकार का हिस्सा बना।
भरतपुर और डीग-कुम्हेर की राजनीति क्यों है अहम?
विश्वेंद्र सिंह की राजनीति को समझने के लिए भरतपुर और डीग-कुम्हेर के स्थानीय समीकरणों को समझना जरूरी है।
यह क्षेत्र लंबे समय से उनकी राजनीतिक जमीन रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में वे डीग-कुम्हेर से कांग्रेस उम्मीदवार थे, लेकिन बीजेपी के शैलेश सिंह से चुनाव हार गए।
इसके बाद 2026 के निकाय चुनावों ने भरतपुर और डीग की राजनीति में एक अलग तस्वीर सामने रखी। भारतपुर और डीग के 13 शहरी निकायों की 415 वार्ड सीटों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने 262 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी को 131 और कांग्रेस को सिर्फ 19 वार्ड मिले।
निकाय चुनाव के इस प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण और स्थानीय संगठन को लेकर सवाल उठने लगे।
डोटासरा से क्यों बढ़ी विश्वेंद्र सिंह की दूरी?
निकाय चुनाव के बाद विश्वेंद्र सिंह ने सीधे कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर निशाना साधा।
उन्होंने आरोप लगाया कि भरतपुर और डीग में टिकट वितरण के दौरान वास्तविक और पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर कुछ पसंदीदा लोगों को टिकट दिए गए। विश्वेंद्र सिंह ने इसके लिए स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व के साथ-साथ प्रदेश नेतृत्व को भी जिम्मेदार ठहराया और डोटासरा के इस्तीफे की मांग की।
विश्वेंद्र सिंह का सवाल था कि जब भरतपुर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र है, तब कांग्रेस को यहां मजबूत प्रदर्शन करना चाहिए था। लेकिन निकाय चुनाव में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन ने संगठन पर सवाल खड़े कर दिए।
दूसरी तरफ डोटासरा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे बीजेपी का प्रचार बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में किसी तरह का विवाद नहीं है।
नेम सिंह फौजदार का नाम क्यों आया?
भरतपुर की इस राजनीतिक कहानी में नेम सिंह फौजदार का नाम भी चर्चा में है।
आपके बताए राजनीतिक इनपुट के मुताबिक, भरतपुर में हनुमान बेनीवाल की रैली कराने वाले नेम सिंह फौजदार से डोटासरा की मुलाकात को लेकर विश्वेंद्र सिंह नाराज बताए जा रहे हैं।
डोटासरा की ओर से हनुमान बेनीवाल को कांग्रेस के साथ लाने की संभावनाओं को लेकर दिए गए राजनीतिक संकेतों ने भी भरतपुर के स्थानीय समीकरणों में चर्चा पैदा की है।
हालांकि नेम सिंह फौजदार और विश्वेंद्र सिंह के बीच इस घटनाक्रम को लेकर किसी प्रत्यक्ष आधिकारिक बयान या दस्तावेज से सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती है। इसलिए इसे फिलहाल राजनीतिक घटनाक्रम के एक संभावित एंगल के रूप में देखना उचित होगा।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर भी नाराजगी?
विश्वेंद्र सिंह की नाराजगी का एक और स्थानीय एंगल संगठन में नियुक्तियों से जुड़ा बताया जा रहा है।
आपके इनपुट के मुताबिक, विश्वेंद्र सिंह चाहते थे कि डीग क्षेत्र से किसी स्थानीय कांग्रेस नेता को जिला संगठन की जिम्मेदारी दी जाए, जबकि पार्टी नेतृत्व ने अलग फैसला किया।
स्थानीय संगठन में नियुक्तियों और टिकट वितरण को लेकर असहमति ने पहले से मौजूद दूरी को और बढ़ाया। इसके बाद विश्वेंद्र सिंह की ओर से लगातार सोशल मीडिया पर कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ बयान सामने आने लगे।
बीजेपी से फिर नजदीकी की चर्चा क्यों?
विश्वेंद्र सिंह के कांग्रेस छोड़ने की खबर के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनका अगला राजनीतिक कदम क्या होगा?
इसका कारण भी उनके राजनीतिक इतिहास में छिपा है।
विश्वेंद्र सिंह पहले बीजेपी के सांसद रह चुके हैं। इसलिए कांग्रेस से दूरी के बाद बीजेपी में उनकी संभावित वापसी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू होना स्वाभाविक है। कुछ मीडिया रिपोर्टों ने भी उनके बीजेपी में जाने की संभावनाओं का उल्लेख किया है, लेकिन फिलहाल किसी नई पार्टी में उनके औपचारिक रूप से शामिल होने की घोषणा नहीं हुई है।
यानी अभी सवाल खुला हुआ है।
भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र में नया सियासी समीकरण?
भरतपुर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र है। 2026 के निकाय चुनाव में यहां निर्दलीयों का प्रदर्शन और बाद में बोर्ड गठन को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हुईं।
बीजेपी नेताओं ने दावा किया कि कई निर्दलीय उम्मीदवार पार्टी समर्थक थे और बोर्ड गठन में बीजेपी के साथ आए। कांग्रेस ने इसके विपरीत बीजेपी पर निर्दलीयों को अपने साथ लेने के लिए राजनीतिक जोड़तोड़ के आरोप लगाए।
इसी पृष्ठभूमि में विश्वेंद्र सिंह का कांग्रेस से अलग होना भरतपुर की राजनीति में एक नया समीकरण पैदा कर सकता है—लेकिन इसका वास्तविक असर आगे उनके राजनीतिक कदम और स्थानीय नेताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
विश्वेंद्र सिंह की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत क्या रही?
विश्वेंद्र सिंह की राजनीतिक यात्रा में एक बात लगातार दिखाई देती है—पार्टी बदलने के बावजूद भरतपुर की अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखना।
कांग्रेस से जनता दल, फिर बीजेपी और वापस कांग्रेस।
गहलोत सरकार में मंत्री पद।
2020 में पायलट खेमे के साथ मानेसर।
इसके बाद फिर गहलोत सरकार में वापसी।
और अब कांग्रेस नेतृत्व से खुला टकराव।
इसीलिए विश्वेंद्र सिंह की कहानी को केवल 'पार्टी बदलने' की कहानी मानना भरतपुर के पूरे राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
यह कहानी भरतपुर के स्थानीय संगठन, जाट राजनीति, राजघराने की विरासत, डीग-कुम्हेर की राजनीतिक जमीन और राजस्थान कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चले आ रहे गुटीय समीकरणों से भी जुड़ी है।
अब सबसे बड़ा सवाल—विश्वेंद्र सिंह का अगला कदम क्या?
2 अक्टूबर 2026 का घटनाक्रम एक नया राजनीतिक सवाल छोड़ गया है।
क्या विश्वेंद्र सिंह वास्तव में कांग्रेस से पूरी तरह अलग हो चुके हैं?
क्या वे किसी दूसरी पार्टी का रुख करेंगे?
क्या बीजेपी में उनकी वापसी होगी?
या फिर भरतपुर की स्थानीय राजनीति में कोई नया राजनीतिक मंच तैयार होगा?
इन सवालों का जवाब अभी सामने नहीं आया है।
फिलहाल इतना जरूर है कि निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस में शुरू हुआ भरतपुर का विवाद अब प्रदेश स्तर तक पहुंच चुका है। विश्वेंद्र सिंह और डोटासरा के बीच सार्वजनिक टकराव ने राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
और सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—
डोटासरा से ऐसा क्या हुआ कि भरतपुर के पूर्व महाराजा विश्वेंद्र सिंह इतने नाराज हो गए?
क्या यह सिर्फ टिकट वितरण और संगठन की नाराजगी है?
या इसके पीछे भरतपुर की राजनीति में बदलते हुए बड़े समीकरण हैं?
इसका जवाब आने वाले दिनों में विश्वेंद्र सिंह के अगले राजनीतिक कदम से काफी हद तक साफ हो सकता है।
