राजस्थान में 4 साल से फसली ऋण संकट गहराया, 4 लाख से अधिक किसान प्रभावित, निर्धारण समिति पर सवाल

Monday, Jun 15, 2026-02:30 PM (IST)

नागौर: राजस्थान में किसानों को लेकर एक गंभीर आर्थिक संकट सामने आ रहा है, जहां पिछले चार वर्षों से लाखों किसान फसली ऋण से वंचित हैं। नागौर जिले के खींवसर क्षेत्र सहित प्रदेशभर में सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि ग्राम सेवा सहकारी समितियां पुराने सदस्यों को ही प्राथमिकता देकर ऋण वितरित कर रही हैं, जबकि नए किसानों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, राज्य में चार लाख से अधिक किसान पिछले चार वर्षों से अल्पकालीन फसली ऋण नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। इससे किसानों को मजबूरी में साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर ऋण लेना पड़ रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर होती जा रही है। किसानों का आरोप है कि निर्धारित फसल ऋण का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही उन्हें दिया जा रहा है, वह भी सीमित संख्या में किसानों को।

कई मामलों में तो स्थिति और गंभीर है, जहां किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना के तहत उन्हें डेढ़ लाख रुपये तक का ऋण मिलना चाहिए, लेकिन उन्हें केवल 10 हजार रुपये देकर ही संतुष्ट कर दिया जाता है। इसमें भी विभिन्न कटौतियों और शुल्कों के बाद किसानों को मात्र 8500 रुपये ही हाथ में मिलते हैं।

किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यह भी है कि पहले रबी और खरीफ फसलों के लिए अलग-अलग ऋण दिया जाता था, लेकिन अब दोनों फसलों को एक ही ऋण राशि में शामिल कर दिया गया है। इससे किसानों के सामने खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।

प्रदेश में सहकारी समितियों के 1,36,603 नए सदस्य बनाए गए हैं, लेकिन इन्हें किसी प्रकार का ऋण नहीं दिया जा रहा है। इससे सहकारी प्रणाली पर किसानों का भरोसा कम होता जा रहा है और वे धीरे-धीरे इन समितियों से दूरी बनाने लगे हैं।

इस पूरे मामले में जिला स्तरीय ऋण निर्धारण कमेटी की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यह कमेटी हर तीन वर्ष में फसलवार वित्तीय सीमा तय करती है, जिसमें लीड बैंक, यूको बैंक, मरुधरा बैंक, सहकारी समितियों और कृषि विभाग के अधिकारी शामिल होते हैं। कमेटी का उद्देश्य किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुसार फसली ऋण उपलब्ध कराना है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं हो रहा।

किसानों का कहना है कि निर्धारित मापदंड के अनुसार ऋण नहीं मिलने के कारण पूरी व्यवस्था केवल कागजी बनकर रह गई है। वास्तविकता में किसानों को केवल 10 प्रतिशत राशि ही मिल पा रही है, जिससे खेती की पूरी प्रक्रिया उधारी पर निर्भर हो गई है।

किसान संगठनों ने सरकार से मांग की है कि इस प्रणाली की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और वास्तविक जरूरत के अनुसार फसली ऋण वितरण सुनिश्चित किया जाए। साथ ही निर्धारण समिति की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाकर किसानों को उनका हक दिलाया जाए।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले किसानों की यह स्थिति प्रदेश की कृषि व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखी जा रही है।


Content Editor

Anil Jangid

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