सूरतगढ़ में कोर्ट आदेश के बावजूद FIR दर्ज नहीं, पुलिस पर अवमानना की तलवार | ADJ कोर्ट में तीखी बहस

Wednesday, May 27, 2026-01:08 PM (IST)

सूरतगढ़ । न्यायालय के सख्त आदेशों के बावजूद सूरतगढ़ शहर थाना पुलिस द्वारा चार दिन बीत जाने के बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं किए जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। परिवादी पक्ष ने आरोप लगाया है कि न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है, जिससे आमजन में कानून व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, एसीजेएम न्यायालय सूरतगढ़ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए सूरतगढ़ शहर थानाधिकारी सहित संबंधित लोकसेवकों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करते हुए सात घंटे के भीतर मुकदमा दर्ज करने के सख्त आदेश जारी किए थे। न्यायालय ने मामले में लापरवाही बरतने वाले दोषी कार्मिकों को अन्यत्र लगाने के निर्देश भी दिए थे।

बताया जा रहा है कि न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया था कि यदि आदेशों की पालना नहीं होती है तो संबंधित डीएसपी और एसपी के खिलाफ भी अवमानना की कार्रवाई अमल में लाई जा सकती है। इसके बावजूद चार दिन गुजर जाने के बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं होने से न्यायालय के आदेशों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं।

एडीजे कोर्ट श्रीगंगानगर में सुनवाई के दौरान तीखी बहस
इधर मामले को लेकर आज एडीजे कोर्ट श्रीगंगानगर में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं के बीच तीखी बहस देखने को मिली। जानकारी के अनुसार, सूरतगढ़ शहर थानाधिकारी सहित मामले में संलिप्त लोकसेवकों की ओर से दायर निगरानी याचिका पर सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता श्याम चुघ के एसोसिएट अधिवक्ता सुशील चुघ की ओर से दायर वकालतनामे पर बहस शुरू हुई तो श्याम चुघ पैरवी के लिए उपस्थित हुए। इस पर परिवादी रामकृष्ण जाखड़ की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता तुषार कामरा ने न्यायालय में एप्लिकेशन पेश करते हुए आपत्ति दर्ज कराई कि श्याम चुघ पहले इसी मामले में रामकृष्ण जाखड़ की ओर से पैरवी कर चुके हैं तथा उन्हें मामले की गोपनीय जानकारी है, ऐसे में वे दूसरी ओर से पैरवी कैसे कर सकते हैं।क्योंकी advocate act 1961 के Part VI, Chapter II (Standards of Professional Conduct and Etiquette) की धारा 35 के अनुसार अधिवक्ता का दायित्व है कि वह अपने मुवक्किल की गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखे और उसका दुरुपयोग न करे। इसलिए कामरा ने तर्क रखा की इस नियम के अनुसार श्याम चुघ पैरवी नही कर सकते हैं।तो वही  तुषार कामरा ने यह भी तर्क रखा कि जिन अधिवक्ता के नाम से वकालतनामा पेश किया गया है, उनका नाम बार के वकालतनामे से काटा जा चुका है, जबकि दूसरे वकालतनामे पर उनका नाम पहले से दर्ज है। ऐसे में वकालतनामे की वैधता को लेकर भी सवाल उठाए गए।

इस बहस के बाद सारण के मामले में अधिवक्ता सुशील बिश्नोई के नाम से नया वकालतनामा पेश किया गया। वहीं जब पहले पेश की गई फाइल से संबंधित अन्य वकालतनामा मांगा गया तो वो फाईल में नहीं  पाया गया और न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया जा सका। मामले में हुई इस तीखी बहस के बाद न्यायालय ने फिलहाल अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है।

परिवादी पक्ष का कहना है कि बार-बार गुहार लगाने के बावजूद पुलिस प्रशासन कार्रवाई से बचता नजर आ रहा है। वहीं क्षेत्र में इस मामले को लेकर आमजन और सामाजिक संगठनों में भी नाराजगी दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि यदि न्यायालय के आदेशों की ही पालना नहीं होगी तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करेगा।

अब सभी की नजरें प्रशासन और पुलिस विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। वहीं यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है।


Content Editor

Kuldeep Kundara

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