महात्मा ज्योतिबा फुले: महिला शिक्षा के अग्रदूत और समाज सुधार के प्रेरणास्रोत
Saturday, Apr 11, 2026-02:21 PM (IST)
उदयपुर। महात्मा ज्योतिबा फुले भारतीय समाज सुधार आंदोलन के ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उनका प्रसिद्ध ध्येय वाक्य—“विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई…”—आज भी समाज के समग्र विकास का मार्गदर्शन करता है।
11 अप्रैल 1827 को पुणे में जन्मे ज्योतिबा फुले साधारण माली परिवार से थे। प्रारंभिक जीवन में ही माता के निधन और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने शिक्षा का महत्व समझा और 21 वर्ष की आयु में अपनी पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1840 में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हुआ, जो आगे चलकर देश की पहली महिला शिक्षिका बनीं।
फुले दंपत्ति ने 1848 में भारत की पहली बालिका पाठशाला की स्थापना कर समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव रखी। विरोध, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक दबावों के बावजूद उन्होंने शिक्षा के इस अभियान को जारी रखा और कई अन्य विद्यालय भी प्रारंभ किए।
महात्मा फुले ने महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए बाल विवाह का विरोध और विधवा विवाह का समर्थन किया। उन्होंने पुरोहितवाद और सामाजिक आडंबरों के खिलाफ आवाज उठाई तथा बिना ब्राह्मणों के विवाह संपन्न कराने की पहल की, जिसे न्यायालय द्वारा भी मान्यता मिली। 1873 में उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना कर शोषित वर्गों को न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया।
उनकी प्रमुख कृतियों में गुलामगिरी, तृतीय रत्न और किसान का कोड़ा शामिल हैं। किसानों की स्थिति सुधारने हेतु उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ लागू किया गया। उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 1888 में उन्हें “महात्मा” की उपाधि से सम्मानित किया गया तथा 1883 में उन्हें “स्त्री शिक्षा के आद्यजनक” के रूप में मान्यता मिली।
आज के समय में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और सशक्तिकरण महात्मा फुले के दूरदर्शी विचारों की प्रासंगिकता को दर्शाता है। उनकी जयंती के अवसर पर समाज को महिला शिक्षा और समानता के प्रति पुनः संकल्पित होने की आवश्यकता है।
— डॉ. मनोज कुमार बहरवाल
प्राचार्य, सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय, अजमेर।
