अरावली संरक्षण के साथ आदिवासी अधिकारों की रक्षा जरूरी: बंशी लाल कटारा ने हाई पावर कमेटी के समक्ष रखी मांगें
Monday, Aug 10, 2026-03:52 PM (IST)
उदयपुर, 10 अगस्त। अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण और दक्षिण राजस्थान के आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर बंशी लाल कटारा ने सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी के समक्ष ज्ञापन प्रस्तुत किया। उदयपुर जिला परिषद सभागार में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने अरावली संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन कायम करने की मांग उठाई।
बंशी लाल कटारा ने कहा कि अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि दक्षिण राजस्थान के जल, जंगल, जमीन, जैव-विविधता और आदिवासी जीवन की जीवनरेखा है। उन्होंने कहा कि अरावली के संरक्षण की किसी भी नीति में स्थानीय आदिवासी समुदायों की भूमिका और अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अरावली की पहचान वैज्ञानिक आधार पर तय करने की मांग
कटारा ने हाई पावर कमेटी के सामने मांग रखी कि अरावली की पहचान केवल पहाड़ों की ऊंचाई के आधार पर निर्धारित नहीं की जाए। इसके लिए वैज्ञानिक भू-विज्ञान, जलग्रहण क्षेत्र, जैव-विविधता और पारिस्थितिक महत्व को भी आधार बनाया जाए।
उन्होंने अरावली क्षेत्र की वैज्ञानिक Geo-Mapping कराने के साथ-साथ इसकी Carrying Capacity Assessment कराने की मांग भी रखी, ताकि क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता के अनुरूप ही विकास गतिविधियों को अनुमति दी जा सके।
पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्रामसभा की भागीदारी
ज्ञापन में पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्रामसभा और आदिवासी समुदाय की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया। कटारा के मुताबिक अरावली से जुड़े विकास और पर्यावरणीय फैसलों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है, क्योंकि इन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी सदियों से जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के साथ जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े निर्णय स्थानीय लोगों की सहमति, अधिकारों और आजीविका को ध्यान में रखते हुए लिए जाने चाहिए।
खनन पर कठोर नियंत्रण और भूमि पुनर्स्थापन की मांग
कटारा ने पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील अरावली क्षेत्रों में खनन पर कठोर नियंत्रण की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि जहां खनन की अनुमति दी जाती है, वहां खनन के बाद भूमि के वैज्ञानिक तरीके से पुनर्स्थापन को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी मांग रखी कि DMF, CAMPA और CSR जैसी निधियों का उपयोग प्रभावित क्षेत्रों में जल संरक्षण, पर्यावरण पुनर्स्थापन और स्थानीय आजीविका को मजबूत करने के लिए किया जाए।
'विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा नहीं किया जाए'
बंशी लाल कटारा ने कहा कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखने के बजाय वैज्ञानिक और संतुलित नीति तैयार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अरावली के संरक्षण का विरोधी नहीं है, बल्कि वह इस संरक्षण व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण भागीदार हो सकता है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "अरावली बचे, आदिवासी अधिकार बचें और विकास भी वैज्ञानिक एवं सतत हो।"
दक्षिण राजस्थान और वागड़ के लिए विशेष अध्ययन की मांग
कटारा ने हाई पावर कमेटी से दक्षिण राजस्थान और वागड़ क्षेत्र की अरावली तथा उससे जुड़े जनजातीय समुदायों को लेकर विशेष सामाजिक-पर्यावरणीय अध्ययन कराने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि अरावली संरक्षण की नीति बनाते समय क्षेत्र की भौगोलिक, पर्यावरणीय और सामाजिक परिस्थितियों का अलग-अलग अध्ययन किया जाना चाहिए, ताकि संरक्षण के साथ स्थानीय आदिवासी समुदायों के अधिकार और आजीविका भी सुरक्षित रह सकें।
मुख्य मांगें
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अरावली की पहचान वैज्ञानिक और पारिस्थितिक आधार पर तय की जाए।
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पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्रामसभा और आदिवासी समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो।
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अरावली की वैज्ञानिक Geo-Mapping कराई जाए।
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Carrying Capacity Assessment कराया जाए।
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संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर कठोर नियंत्रण हो।
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खनन के बाद भूमि पुनर्स्थापन अनिवार्य किया जाए।
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DMF, CAMPA और CSR निधियों का उपयोग प्रभावित क्षेत्रों के विकास में हो।
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दक्षिण राजस्थान और वागड़ क्षेत्र के लिए विशेष सामाजिक-पर्यावरणीय अध्ययन कराया जाए।
