डिजिटल दौर में हाथ से लिखी चिट्ठियों की अहमियत पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, तीन पुस्तकों का विमोचन

Wednesday, Oct 28, 2026-03:01 PM (IST)

जयपुर, 28 अक्टूबर। डिजिटल युग में तेजी से बदलते संवाद के तरीकों के बीच हाथ से लिखे पत्रों की भावनात्मक अहमियत और साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से जयपुर में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर और ‘पाती अपनों को’ मुहिम के संयुक्त तत्वावधान में आंबेडकर वेलफेयर सोसाइटी में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय ‘डिजिटल दौर में हाथ से लिखे पत्रों की भूमिका’ रहा।

कार्यक्रम में देशभर से आए साहित्यकारों, लेखकों, शिक्षाविदों और विद्यार्थियों ने पत्र लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाने पर विचार साझा किए। इस अवसर पर तीन पुस्तकों का विमोचन किया गया और विद्यार्थियों, प्रधानाचार्यों तथा पत्र लेखकों को सम्मानित किया गया।

‘हाथ से लिखी चिट्ठियां रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाती हैं’

‘पाती अपनों को’ मुहिम के संयोजक, साहित्यकार एवं राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. सूरज सिंह नेगी ने कहा कि जीवन में धन-संपदा और पद-प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण रिश्तों की मजबूती है। वर्तमान समय में आपसी संवाद को मजबूत बनाना और रिश्तों को सहेजना बेहद जरूरी है।

डॉ. नेगी ने कहा कि डिजिटल युग में दुनिया ग्लोबल विलेज बन गई है, लेकिन भावनात्मक स्तर पर लोग अपनों से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में हाथ से लिखी चिट्ठियां रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं। पत्रों के जरिए व्यक्ति अपनी भावनाओं, संवेदनाओं और आत्मीयता को जिस तरह व्यक्त करता है, उससे रिश्तों में नई गर्माहट आती है।

उन्होंने बताया कि लुप्त होती पत्र लेखन विधा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से पिछले आठ वर्षों से ‘पाती अपनों को’ मुहिम चलाई जा रही है। इस दौरान 24 अखिल भारतीय पाती लेखन प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं और 17 पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। मुहिम के तहत अब तक साढ़े तीन लाख से अधिक हस्तलिखित पत्र प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें ढाई लाख से अधिक पत्र स्कूली विद्यार्थियों ने लिखे हैं।

घर और शिक्षण संस्थानों में पत्र लेखन को बढ़ावा देने पर जोर

संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव मीनाक्षी रावत ने की। उन्होंने कहा कि हाथ से लिखे पत्रों को घर, परिवार, समाज और शिक्षण संस्थानों में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। बच्चों को पत्र लेखन का महत्व समझाकर अपनी भावनाओं को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए प्रेरित करना जरूरी है।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि लेखिका एवं हरियाणा के फरीदाबाद की पूर्व खंड शिक्षा अधिकारी डॉ. इंदू गुप्ता रहीं। विशिष्ट अतिथि रतन कुमार सांभरिया ने हिंदी साहित्य में पत्रों के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्हें साहित्य की अनमोल धरोहर बताया।

ग्वालियर की लेखिका एवं आकाशवाणी ग्वालियर की पूर्व प्रोग्रामर सीमा जैन ने हस्तलिखित पत्रों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर विचार रखे। उन्होंने बच्चों को ‘पाती अपनों को’ मुहिम से जोड़ने की पहल की सराहना की।

संगोष्ठी में भोपाल की लता अग्रवाल, अजमेर की डॉ. छाया शर्मा और डॉ. सुधा मित्तल, बूंदी की उम्मेहबीबा जिलानी, श्रीगंगानगर की शमिंद्र कौर तथा जोधपुर की डॉ. शालिनी गोयल सहित कई लेखकों ने पत्र वाचन किया। वक्ताओं ने मुहिम से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए पत्र लेखन की भावनात्मक और सामाजिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

तीन पुस्तकों का विमोचन, पत्र लेखन की यात्रा को मिला दस्तावेजी रूप

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पत्र लेखन और ‘पाती अपनों को’ मुहिम पर आधारित तीन पुस्तकों का विमोचन किया गया।

  • ‘पेड़ हमारे जीवनदाता’: इस पुस्तक में स्कूली बच्चों द्वारा अपने अभिभावकों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से लिखे गए पत्रों का संकलन है।

  • ‘लिख दी चिट्ठियां माई को’: इस पुस्तक में 109 पाती लेखकों द्वारा अपनी मां को लिखे गए पत्र शामिल हैं।

  • ‘पाती अपनों को मुहिम (एक अनवरत यात्रा)’: डॉ. सूरज सिंह नेगी और प्रो. मीना सिरोला द्वारा लिखित यह पुस्तक पिछले आठ वर्षों में मुहिम के सफर, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रस्तुत करती है।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता आईआईटी मुंबई की मानविकी पीठ के विभागाध्यक्ष प्रो. विक्रम सिंह सिरोला ने की। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में जयपुर के डॉ. बजरंग सोनी और ‘नारी कभी न हारी’ संस्थान की संस्थापिका बीना चौहान उपस्थित रहीं।

प्रो. विक्रम सिंह सिरोला ने ‘पाती अपनों को’ मुहिम को मील का पत्थर बताते हुए कहा कि परिवारों में आपसी संवाद और आत्मीय संबंध बनाए रखने में हाथ से लिखे पत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

26 विद्यार्थियों और 20 प्रधानाचार्यों सहित पत्र लेखकों का सम्मान

कार्यक्रम के दौरान पत्र लेखन, सामाजिक जागरूकता और मुहिम में सहभागिता के लिए 26 स्कूली विद्यार्थियों और 20 प्रधानाचार्यों को प्रशस्ति पत्र, सम्मान राशि तथा पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया गया।

वहीं, ‘लिख दी चिट्ठियां माई को’ पुस्तक में योगदान देने वाले 109 लेखकों को भी प्रशस्ति पत्र और पुस्तक भेंट की गई। कार्यक्रम में देशभर से आए लेखक, साहित्यकार, विद्यार्थी, शिक्षाविद और संस्था प्रधान शामिल हुए। ‘पाती अपनों को’ मुहिम की संयोजिका प्रो. मीना सिरोला सहित बड़ी संख्या में लोगों ने सहभागिता की।

संगोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद हस्तलिखित पत्रों की भावनात्मक अहमियत कम नहीं हुई है। पत्र लेखन न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि यह रिश्तों में आत्मीयता बढ़ाने, नई पीढ़ी में लेखन के प्रति रुचि विकसित करने और साहित्यिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण प्रयास भी है।


Content Editor

Sourabh Dubey

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