वनस्थली विद्यापीठ में जनजातीय गौरव दिवस पर राष्ट्रीय कार्यशाला, जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान पर हुई चर्चा

Monday, Nov 02, 2026-02:32 PM (IST)

टोंक। वनस्थली विद्यापीठ के समाजशास्त्र विभाग की ओर से जनजातीय गौरव दिवस 2026 के अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य विषय जनजातीय जीवन-शैली, पारिस्थितिक ज्ञान और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज के योगदान पर केंद्रित रहा। इसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं एवं ऐतिहासिक योगदान पर विचार साझा किए।

कार्यशाला की मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग की प्रो. अर्चना कौशिक रहीं, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में वनस्थली विद्यापीठ के स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड फैकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सृष्टि शास्त्री मौजूद रहीं।

जनजातीय कला और संस्कृति को बढ़ावा देने पर जोर

कार्यशाला के दौरान जनजातीय समाज के इतिहास, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक चुनौतियों, पारंपरिक ज्ञान और विकास की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की गई। सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन एवं समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. हितेंद्र सिंह राठौर ने जनजातीय कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करने के प्रति वनस्थली विद्यापीठ की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने जनजातीय गौरव दिवस मनाने के महत्व और जनजातीय समुदायों के योगदान को पहचान देने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि डॉ. सृष्टि शास्त्री ने भारतीय जनजातीय कला की विविधता और समृद्ध परंपराओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने प्रतिभागियों को विभिन्न जनजातीय कला शैलियों को समझने और उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं को पहचानने के लिए प्रेरित किया।

जंगल को बताया संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र

मुख्य वक्ता प्रो. अर्चना कौशिक ने अपने व्याख्यान में जंगल को एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बताते हुए जनजातीय जीवन में प्रकृति, जल, जंगल और जमीन के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि जनजातीय समुदायों का पारंपरिक जीवन प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और पारिस्थितिक संतुलन की समझ पर आधारित है।

कार्यशाला के दौरान 'वर्ड क्लाउड' गतिविधि भी आयोजित की गई। इसमें प्रतिभागियों ने जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न शब्द लिखकर अपने विचार और समझ साझा की।

एथ्नोमेडिसिन और जनजातीय चित्रकला से रूबरू हुए प्रतिभागी

कार्यशाला में 'एथ्नोमेडिसिन ट्रेजर हंट' गतिविधि के माध्यम से प्रतिभागियों को जनजातीय समुदायों की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और औषधीय पौधों के उपयोग की जानकारी दी गई। इस गतिविधि का उद्देश्य पारंपरिक औषधीय ज्ञान और जनजातीय समुदायों के अनुभवों से प्रतिभागियों को परिचित कराना रहा।

इसके अलावा 'सेलिब्रेटिंग ट्राइबल आर्ट' गतिविधि के तहत गोंड, भील और वारली चित्रकला शैलियों के माध्यम से जनजातीय कला एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रदर्शित किया गया।

कार्यशाला के माध्यम से जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान, प्रकृति संरक्षण में उनकी भूमिका और भारतीय इतिहास में उनके योगदान को समझने का अवसर मिला। साथ ही जनजातीय कला एवं विरासत के संरक्षण और संवर्धन के प्रति जागरूकता का संदेश भी दिया गया।


Content Editor

Ishika Jain

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