मेडल के बाद भी क्यों रहती है बेचैनी? MMA खिलाड़ियों ने आचार्य प्रशांत से पूछे जीत और तुलना से जुड़े सवाल

Friday, Oct 09, 2026-01:22 PM (IST)

जयपुर। जीतने के बाद भी किसी दूसरे खिलाड़ी का बेहतर प्रदर्शन रातों की नींद क्यों उड़ा देता है? अगर किसी ने दूसरों से देर से खेल शुरू किया हो, तो क्या वह हमेशा पीछे ही रहेगा? और एक खिलाड़ी का असली मुकाबला सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी से है या खुद से?

ये सवाल ग्रेटर नोएडा के बोधस्थल ऑडिटोरियम में भगवद्गीता पर केंद्रित आचार्य प्रशांत के एक सत्र में उठे। सवाल पूछने वाली दो युवा MMA खिलाड़ी आर्या चौधरी और रेवा भदौरिया थीं। दोनों राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

गीता से शुरू हुई बात

सत्र की शुरुआत में आचार्य प्रशांत ने कहा, “आप अपनी इच्छाओं के कैदी बने हुए हैं।” करीब साढ़े तीन घंटे चले सत्र के पहले डेढ़ घंटे उन्होंने भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 37वें श्लोक की व्याख्या की। इसके बाद करीब आधे घंटे सामान्य सवाल-जवाब हुए और आखिरी करीब डेढ़ घंटे खिलाड़ियों ने अपनी व्यक्तिगत उलझनें सामने रखीं।

सभागार में करीब 150 लोग मौजूद थे। आयोजकों के अनुसार करीब 80 हजार लोग ऑनलाइन भी सत्र से जुड़े। इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि यह संवाददाता नहीं कर सका।

लेखक और सार्वजनिक वक्ता आचार्य प्रशांत वेदांत और भगवद्गीता की समकालीन व्याख्या के लिए जाने जाते हैं। वह IIT दिल्ली और IIM अहमदाबाद से पढ़े हैं।

आर्या और रेवा पहली बार आचार्य प्रशांत के किसी सत्र में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुई थीं। आर्या उन्हें पहले से ऑनलाइन सुनती रही हैं और उन्होंने खुद प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन से संपर्क कर सत्र में अपने सवाल पूछने की इच्छा जताई थी। उनके साथ उनके कोच विकास शर्मा भी मौजूद थे, जो रेवा के भी कोच हैं।

शुरुआत में दोनों खिलाड़ियों के लिए माहौल कुछ अलग था। आर्या ने बाद में बताया कि कुछ दार्शनिक बातें तुरंत समझ नहीं आईं और उन्हें बाद में संदर्भ जोड़कर समझने में आसानी हुई। रेवा ने भी माना कि सत्र लंबा था और भाषा कुछ जगह कठिन थी, लेकिन वह लगातार ध्यान से सुनती रहीं।

पदक जीतने के बाद भी क्यों रहती है बेचैनी?

आर्या चौधरी ने 2025 की IMMAF वर्ल्ड MMA चैंपियनशिप में कांस्य पदक और एशियन चैंपियनशिप में जूनियर महिला एटमवेट वर्ग का स्वर्ण जीता। 2026 में उन्होंने अंगोला के लुआंडा में हुए IMMAF Angola Dipanda Open World Cup में सीनियर महिला एटमवेट वर्ग का खिताब भी हासिल किया।

उन्होंने बताया कि ट्रेनिंग के दौरान अगर कोई साथी उनसे बेहतर प्रदर्शन कर दे तो वह बात लंबे समय तक उनके दिमाग में घूमती रहती है। कई बार तुलना इतनी हावी हो जाती है कि रात की नींद तक प्रभावित होती है।

आचार्य प्रशांत ने जवाब में कहा कि खिलाड़ी के नियंत्रण में मुख्य रूप से उसकी अपनी तैयारी और उसका अपना प्रदर्शन है। सामने वाला खिलाड़ी कैसा प्रदर्शन करेगा, मुकाबले के दिन परिस्थितियां कैसी होंगी या शरीर कितना साथ देगा, इन पर पूरा नियंत्रण नहीं होता।

इसी संदर्भ में उन्होंने आर्या से कहा:

“पैमाना आप खुद हैं, इसलिए लगातार खुद से आगे निकलते रहिए।”

यानी दूसरे खिलाड़ी का प्रदर्शन आपका पैमाना नहीं होना चाहिए। आपका अपना पिछला प्रदर्शन अगला benchmark बन सकता है।

“मेरी लड़ाई किसी खिलाड़ी से नहीं, खुद से है”

सत्र के बाद आर्या ने कहा कि उन्हें और रेवा को अपने सवालों के संतोषजनक जवाब मिले और उन्हें काफी clarity मिली।

आर्या ने बताया कि वह आचार्य प्रशांत को पहले reels और shorts में सुनती रही हैं, लेकिन पहली बार सामने से सुनना अलग अनुभव था।

उनके मुताबिक खिलाड़ी किसी दूसरे के प्रदर्शन को नियंत्रित नहीं कर सकता। वह सिर्फ अपनी तैयारी और अपना 100 प्रतिशत देने पर ध्यान दे सकता है।

आर्या ने कहा कि उनका personal benchmark वही हैं और उन्हें लगातार उसे पार करने की कोशिश करनी है। उनके मुताबिक असल मैच सामने वाले से नहीं, खुद से ही होता है।

रेवा का सवाल: क्या मैंने देर से शुरुआत की?

इसके बाद रेवा भदौरिया ने अपनी चिंता रखी।

रेवा राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण और रजत पदक जीत चुकी हैं। 2025 की IMMAF एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता और 2026 की IMMAF यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया।

रेवा ने बताया कि उन्होंने 14 साल की उम्र में MMA की ट्रेनिंग शुरू की। उनके आसपास कई ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने उनसे काफी कम उम्र में प्रशिक्षण शुरू कर दिया था। आर्या भी उनसे पहले से खेल रही थीं।

यही तुलना रेवा के मन में सवाल पैदा करती थी: क्या मैंने MMA शुरू करने में देर कर दी और क्या मैं हमेशा दूसरों से पीछे रहूंगी?

आचार्य प्रशांत ने उन्हें समझाया कि बीता हुआ समय बदला नहीं जा सकता। इसलिए यह सोचते रहना कि दूसरे खिलाड़ी ने कितनी कम उम्र में शुरुआत की, वर्तमान समय के इस्तेमाल को कमजोर कर सकता है।

उन्होंने यह भी समझाया कि किसी दूसरे खिलाड़ी की टाइमलाइन को अपनी क्षमता का पैमाना बनाने से व्यक्ति ऐसी चीज से लड़ने लगता है जो अब उसके नियंत्रण में नहीं है।

रेवा ने बाद में कहा कि उनके लिए यह बात खास तौर पर महत्वपूर्ण रही। उन्हें अपने करियर की शुरुआत को लेकर setback महसूस होता था, लेकिन आचार्य प्रशांत ने उन्हें अलग-अलग real-life examples देकर समझाया कि हर व्यक्ति की journey अलग होती है।

खेल-मनोविज्ञान क्या कहता है?

शोध पत्रिका ‘साइकोलॉजी ऑफ स्पोर्ट एंड एक्सरसाइज’ में 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि दूसरे खिलाड़ियों से तुलना खेल का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन उसका असर इस पर निर्भर करता है कि तुलना किस तरह की है। अपने से थोड़ा बेहतर खिलाड़ी को देखकर प्रेरणा बढ़ सकती है, जबकि बहुत आगे दिखने वाले खिलाड़ी से लगातार तुलना हतोत्साहित भी कर सकती है।

रेवा की चिंता के बारे में भी उपलब्ध शोध एक जरूरी संदर्भ देता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने कम उम्र में ही किसी एक खेल पर केंद्रित हो जाने (स्पेशलाइजेशन) को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है और अधिकांश खेलों में करीब 15-16 वर्ष की उम्र तक स्पेशलाइजेशन टालने को नुकसानदेह नहीं माना है। MMA की अपनी अलग शारीरिक और तकनीकी जरूरतें हैं, इसलिए इन निष्कर्षों को किसी एक खिलाड़ी के भविष्य का सीधा पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि 14 साल की उम्र में शुरुआत करना अपने आप में इस बात का सबूत नहीं है कि खिलाड़ी ने सफलता के लिए बहुत देर कर दी।

कोच विकास शर्मा ने क्या सीखा?

दोनों खिलाड़ियों के कोच विकास शर्मा ने कहा कि खेल का मैदान हो या real life, आचार्य प्रशांत की कई बातें खिलाड़ियों की जिंदगी से जुड़ती हैं।

उन्होंने खास तौर पर उनके समझाने के तरीके की बात की। विकास शर्मा के मुताबिक हर खिलाड़ी एक ही भाषा या एक ही उदाहरण से बात नहीं समझता। कई बार खिलाड़ी अपनी समस्या खुलकर नहीं बता पाता और कोच को उसके व्यवहार से समझना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि अगर पहला तरीका काम न करे तो दूसरा और फिर तीसरा तरीका अपनाना चाहिए। आचार्य प्रशांत भी एक बात को समझाने के लिए कई उदाहरण देते हैं, जिससे अलग-अलग सोच वाले लोगों को बात समझने में आसानी होती है।

विकास शर्मा के मुताबिक वह इस सीख को अपनी coaching में भी इस्तेमाल करना चाहेंगे।

खेल से आगे पहुंची चर्चा

सत्र में मौजूद देश की सेवा में जुटे जवान राहुल यादव ने कहा कि आचार्य प्रशांत की बातें व्यक्ति को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने महिलाओं के संघर्ष और आत्मविश्वास को लेकर भी मिली सीख का जिक्र किया।

वहीं IIT पटना से मैकेनिकल इंजीनियरिंग कर चुकीं वृतिका ने बताया कि वह करीब तीन साल से आचार्य प्रशांत को सुन रही हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य प्रशांत को सुनने के बाद उन्होंने खुद बैडमिंटन, स्क्वैश और अब टेनिस खेलना शुरू किया।

उनके मुताबिक सिर्फ शिक्षा और करियर के अवसर काफी नहीं हैं। व्यक्ति को यह भी समझना होगा कि उसकी अपनी सीमाएं कहां हैं और वह किन वजहों से खुद को रोक रहा है।

असली मुकाबला आखिर किससे?

आर्या और रेवा के सवाल अलग थे, लेकिन उनकी जड़ एक जैसी थी।

आर्या वर्तमान में दूसरे खिलाड़ी के प्रदर्शन से खुद को माप रही थीं, जबकि रेवा अतीत में दूसरे खिलाड़ियों की शुरुआत से अपनी तुलना कर रही थीं।

दोनों मामलों में सवाल यही था, अपने लिए पैमाना किसे बनाया जाए?

खेल के मैदान में मुकाबला सामने खड़े खिलाड़ी से होता है। लेकिन कई बार मेडल जीतने के बाद भी मुकाबला खत्म नहीं होता। तुलना, डर, दबाव और खुद से असंतुष्टि खिलाड़ी के भीतर बनी रह सकती है।

आचार्य प्रशांत के सत्र से दोनों खिलाड़ियों के लिए जो बात सबसे ज्यादा उभरकर आई, वह यही थी कि दूसरे से आगे निकलने की चिंता से ज्यादा जरूरी है अपने पिछले स्तर से आगे बढ़ना।


Content Editor

Sourabh Dubey

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