नेपाल में भीषण तबाही पर उपेंद्र यादव का बड़ा बयान, बोले- ग्लोबल वार्मिंग है संकट की जड़

Sunday, Aug 30, 2026-03:47 PM (IST)

नेपाल में आई भीषण बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने भारी तबाही मचाई है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री उपेंद्र यादव ने पंजाब केसरी डिजिटल से खास बातचीत में मौजूदा हालात, राहत एवं बचाव अभियान, भारत की भूमिका और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे को लेकर कई अहम बातें कहीं।

नेपाल में अब तक की सबसे बड़ी तबाही?

उपेंद्र यादव ने कहा कि नेपाल में ऐसी बड़ी तबाही का अनुभव पहले कभी नहीं हुआ। उनके मुताबिक, अचानक आई तेज बाढ़ ने कई शहरों और बस्तियों को अपनी चपेट में ले लिया। लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का मौका तक नहीं मिला।

उन्होंने बताया कि बाढ़ की रफ्तार इतनी तेज थी कि रास्ते में आने वाले कई पुल और सड़कें बह गईं। सैकड़ों वाहन और हजारों घर बाढ़ की चपेट में आ गए। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं, जबकि कई शव बरामद किए जा चुके हैं।

यादव के मुताबिक, हालात इतने गंभीर हैं कि कई शवों की पहचान करना भी मुश्किल हो रहा है। कहीं शरीर का एक हिस्सा मिल रहा है तो कहीं दूसरा हिस्सा नहीं मिल पा रहा है। इससे राहत और बचाव के साथ-साथ मृतकों की पहचान भी बड़ी चुनौती बन गई है।

ग्लेशियल लेक फटने से आई तबाही?

उपेंद्र यादव ने बताया कि तिब्बत क्षेत्र में बड़ी संख्या में ग्लेशियल और स्नो लेक मौजूद हैं। इनमें से कई झीलों का प्राकृतिक बहाव नेपाल की ओर है। उनके अनुसार, अचानक बर्फ और पानी के बड़े प्रवाह ने नदी में असामान्य रूप से तेज बाढ़ की स्थिति पैदा की।

उन्होंने कहा कि जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां मौसम साफ था और बारिश भी नहीं हो रही थी। इसके बावजूद अचानक नदी का जलस्तर और बहाव इतना बढ़ गया कि आसपास के कई शहर इसकी चपेट में आ गए।

यादव ने यह भी कहा कि कुछ अन्य ग्लेशियल झीलों को लेकर भी खतरे की आशंका बनी हुई है। अगर इनमें से कोई झील टूटती है तो नेपाल के बड़े हिस्से के साथ-साथ भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में भी इसका असर पड़ सकता है।

राहत और बचाव अभियान में बड़ी चुनौतियां

नेपाल में राहत और बचाव अभियान को लेकर उपेंद्र यादव ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती सड़क और पुलों का टूट जाना है। कई इलाकों का ट्रांसपोर्टेशन लिंक पूरी तरह प्रभावित हुआ है। इसके अलावा प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल और संचार नेटवर्क भी बाधित है।

उन्होंने बताया कि ऊंचाई वाले इलाकों तक पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टर का सहारा लेना पड़ रहा है। नेपाल आर्मी, पुलिस और बड़ी संख्या में स्वयंसेवक बचाव अभियान में जुटे हुए हैं। हालांकि नदी किनारे बने दलदली इलाकों में फंसे लोगों को निकालना बेहद मुश्किल है।

तेज पानी का बहाव भी रेस्क्यू टीमों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

भारत की मदद को लेकर क्या बोले उपेंद्र यादव?

भारत और नेपाल के रिश्तों का जिक्र करते हुए उपेंद्र यादव ने कहा कि भारत नेपाल के लिए केवल पड़ोसी या मित्र देश नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच बेहद गहरे संबंध हैं।

उन्होंने कहा कि संकट के समय भारत की मदद महत्वपूर्ण है। राहत और बचाव के बाद जब पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम शुरू होगा, तब नेपाल को बाहरी सहायता की जरूरत पड़ेगी। यादव के अनुसार, आपदा से हुआ नुकसान इतना बड़ा है कि नेपाल के लिए अकेले इसका पुनर्निर्माण करना आसान नहीं होगा।

उन्होंने भारत और नेपाल के बीच नदियों और आपदा प्रबंधन को लेकर संयुक्त रूप से दीर्घकालिक योजना बनाने की जरूरत भी बताई।

भारतीय तीर्थयात्रियों को लेकर भी जताई चिंता

इंटरव्यू के दौरान नेपाल में फंसे भारतीय श्रद्धालुओं का मुद्दा भी उठा। उपेंद्र यादव ने बताया कि गोसाइंकुंड और मानसरोवर जाने वाले रास्तों पर भारत और नेपाल के तीर्थयात्री भी प्रभावित हुए हैं।

उन्होंने कहा कि जो लोग जीवित बचे हैं, उन्हें रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थानों और शेल्टर में पहुंचाया जा रहा है, जबकि लापता लोगों की तलाश जारी है।

DNA और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की जरूरत पर क्या कहा?

बड़ी संख्या में शवों की पहचान मुश्किल होने के सवाल पर यादव ने कहा कि इस स्थिति में फॉरेंसिक और DNA विशेषज्ञों की मदद की जरूरत पड़ सकती है।

उन्होंने बताया कि कई शव बुरी तरह क्षत-विक्षत अवस्था में मिले हैं, जिससे उनकी पहचान सामान्य तरीके से करना कठिन है। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक और फॉरेंसिक तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

ग्लोबल वार्मिंग को बताया संकट की जड़

नेपाल की इस त्रासदी के संभावित कारणों पर बात करते हुए उपेंद्र यादव ने ग्लोबल वार्मिंग को मुख्य चिंता बताया।

उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने और ग्लेशियरों में बदलाव का खतरा बढ़ रहा है। उनका कहना था कि यह केवल नेपाल की समस्या नहीं है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र से जुड़े भारत, चीन, बांग्लादेश समेत कई देशों के लिए गंभीर चुनौती है।

यादव ने विकसित और औद्योगिक देशों से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए अधिक निवेश करने की अपील की। उन्होंने इसे मानवता और प्रकृति के बीच बढ़ते असंतुलन से जोड़ते हुए कहा कि प्राकृतिक संतुलन को बचाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास जरूरी हैं।

भारत, चीन और नेपाल समेत हिमालयी देशों को एक मंच पर आने की जरूरत

उपेंद्र यादव ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले देशों को आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर मिलकर काम करना चाहिए।

उनके मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए इससे निपटने के लिए भी देशों को सीमाओं से ऊपर उठकर साझा रणनीति बनानी होगी।

नेपाल सरकार को भारत के साथ समन्वय बढ़ाने की सलाह

भारत-नेपाल संबंधों पर पूछे गए सवाल के जवाब में उपेंद्र यादव ने कहा कि मौजूदा संकट के समय पुराने विवादों को पीछे छोड़कर दोनों देशों को आपदा से निपटने पर ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने नेपाल सरकार को भारत के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने की सलाह दी और कहा कि इस आपदा से मिलकर लड़ने के लिए दोनों देशों को आगे बढ़ना चाहिए।

नेपाल में आई इस भीषण आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों से जुड़े खतरों को एक बार फिर सामने ला दिया है। उपेंद्र यादव के अनुसार, तत्काल प्राथमिकता राहत और बचाव अभियान है, लेकिन इसके बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती सामने होगी।

साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं के प्रभाव को कम करने के लिए नेपाल, भारत, चीन और अन्य हिमालयी देशों के बीच बेहतर समन्वय, वैज्ञानिक निगरानी और दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन रणनीति की आवश्यकता होगी।


Content Editor

Sourabh Dubey

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