नागौर जिले के गांवों में बदलाव की बयार, कुरीतियों पर चोट कर रहे पढ़े-लिखे युवा

Sunday, Feb 15, 2026-02:24 PM (IST)

नागौर। नागौर जिले के ग्रामीण इलाकों में इस समय बदलाव की हवा चल रही है। पढ़े-लिखे युवा अब सामाजिक कुरीतियों और दिखावे की परंपराओं पर सवाल उठा रहे हैं और उन्हें समाप्त करने के लिए पहल कर रहे हैं। पिछले कई सालों से गांवों में होने वाली शादी-ब्याह, मौसर, पहरावणी-ओढ़ावणी जैसे आयोजनों में खर्च बढ़ गया था, जिसके चलते गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार कर्ज में डूबने लगे थे।

 

इन परंपराओं में अनावश्यक खर्च और दिखावा आम हो गया था। हालांकि, अब शिक्षित युवा इन कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। हाल ही में गागुड़ा, दधवाडा, दधवाडी, सिराधना सहित कई गांवों में समाजिक बैठकों का आयोजन किया गया। इन बैठकों में यह निर्णय लिया गया कि शादी-ब्याह और मौसर जैसे आयोजनों में होने वाला खर्च कम किया जाएगा और इन आयोजनों को सादगीपूर्ण तरीके से मनाया जाएगा। साथ ही, कपड़ों और गहनों के लेन-देन को सीमित करने और अनावश्यक रस्मों को समाप्त करने की सहमति बनी।

 

गागुड़ा, दधवाडा और सिराधना में आयोजित बैठकों में यह निर्णय लिया गया कि मृत्युभोज में तीन तरह के व्यंजन ही रखे जाएंगे, बारात में डीजे की बजाय पारंपरिक संगीत होगा और मायरा तथा पहरावणी में केवल नजदीकी रिश्तेदारों को ही वस्त्र दिए जाएंगे।

 

इस पहल के चलते कई परिवार अब बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर अधिक निवेश करने का संकल्प ले रहे हैं, बजाय अनावश्यक खर्चों के।

 

हालांकि, प्रशासन की भूमिका इस प्रक्रिया में अभी तक सीमित दिख रही है। राज्य सरकार ने मृत्यु भोज पर रोक लगाने के लिए आदेश तो दिए हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता।

 

सामाजिक सुधारक मानते हैं कि अगर समाज स्वयं नियम बनाए और उनका पालन करे, तो बदलाव स्थायी हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में उठी यह नई सोच न केवल खर्चों को नियंत्रित करने तक सीमित है, बल्कि यह सामाजिक समानता और आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा रही है।


Content Editor

Anil Jangid

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