जैसलमेर में चंग की थाप पर झूम उठा खत्री समाज, हिंगलाज मंदिर में पारंपरिक फाग गैर से सजी होली

Wednesday, Mar 04, 2026-11:52 AM (IST)

राजस्थान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर में होली का उत्सव इस बार भी पूरे पारंपरिक रंगों के साथ मनाया गया। शहर के श्री ब्रह्मक्षत्रिय खत्री समाज ने सदियों पुरानी परंपरा को निभाते हुए होली के दूसरे दिन पारंपरिक फाग गैर का आयोजन किया। चंग की थाप, फागणिया गीतों और गुलाल-अबीर के रंगों के बीच निकली इस गैर ने पूरे खत्री पाड़ा को उत्सव के रंग में रंग दिया। इस आयोजन में भक्ति, संस्कृति और आपसी भाईचारे का अनूठा संगम देखने को मिला।

होली के अवसर पर आयोजित इस विशेष फागोत्सव का मुख्य आयोजन रतासर स्थित मां हिंगलाज मंदिर प्रांगण में हुआ। यहां समाज के लोग बड़ी संख्या में एकत्रित हुए और एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर तथा ‘रामा-श्यामा’ कर होली की शुभकामनाएं दीं। इसके बाद गुलाल और अबीर के साथ फागोत्सव की शुरुआत हुई। मां हिंगलाज के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा और पूरा वातावरण आध्यात्मिकता और उल्लास से भर गया।

गली-गली गूंजे चंग और फाग के स्वर

खत्री समाज की पारंपरिक फाग गैर खत्री पाड़ा से गाजे-बाजे के साथ रवाना हुई। हाथों में चंग थामे गेरिये जब फागणिया गीत गाते हुए आगे बढ़े, तो दृश्य बेहद आकर्षक और मनमोहक था। चंग की ताल और फाग गीतों की गूंज से पूरा क्षेत्र उत्सवमय हो गया।

यह गैर शहर के विभिन्न मोहल्लों और गलियों से होकर गुजरी। हर मोहल्ले में लोग घरों से बाहर निकलकर गेरियों का स्वागत करते नजर आए। कई घरों के बाहर गैर को रोका गया, जहां पारंपरिक भजन और फाग गाए गए। लोगों ने गेरियों को मिठाई खिलाई, गुलाल लगाया और होली की शुभकामनाएं देकर स्नेह प्रकट किया।

गैर के दौरान बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने मिलकर होली के रंगों का आनंद लिया। गुलाल उड़ता रहा और चंग की ताल पर लोग थिरकते रहे। इस आयोजन ने जैसलमेर की लोकसंस्कृति और सामूहिक परंपराओं की जीवंत झलक प्रस्तुत की।

युवाओं ने संभाली परंपरा की कमान

समाज के बुजुर्गों के साथ-साथ युवाओं की भागीदारी इस आयोजन की खास बात रही। समाज के युवा लगातार इस परंपरा को जीवित रखने के लिए आगे आ रहे हैं।

गैर में शामिल गेरिये खेमचंद खत्री ने बताया कि चंग की थाप खत्री समाज की होली की असली पहचान है। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और समाज के लोग इसे पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से समाज के युवाओं ने चंग के साथ फाग गायन की जिम्मेदारी संभाली है, जिससे यह लोक परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। युवाओं के इस प्रयास से समाज की सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित और जीवित बनी हुई है।

हर घर के आगे गाए गए भजन और फाग

पारंपरिक गैर के दौरान गेरिये जब अलग-अलग मोहल्लों से गुजरे, तो हर घर के सामने रुककर भजन और फाग गीत गाए गए। यह दृश्य सामाजिक एकता और प्रेम का प्रतीक बना।

मोहल्लेवासियों ने भी इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। लोगों ने अपने घरों के बाहर आकर गेरियों का स्वागत किया, मिठाई खिलाई और गुलाल लगाकर स्नेह जताया। इस दौरान कई जगह लोगों ने ढोल और चंग की ताल पर नृत्य भी किया।

इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि परंपराएं केवल उत्सव नहीं होतीं, बल्कि समाज को जोड़ने और संस्कृति को आगे बढ़ाने का माध्यम भी होती हैं।

हिंगलाज मंदिर में आरती के साथ हुआ समापन

फाग गैर का समापन मां हिंगलाज मंदिर के सामने सामूहिक आरती के साथ हुआ। मंदिर परिसर में समाज के सभी लोगों ने एक साथ आरती कर मां हिंगलाज का आशीर्वाद लिया और समाज की खुशहाली की कामना की।

इस अवसर पर खत्री समाज जैसलमेर के अध्यक्ष सत्यनारायण दड़ा ने उपस्थित सभी समाज बंधुओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि होली का यह महापर्व समाज में एकता, सद्भावना और आपसी प्रेम को बढ़ावा देता है।

उन्होंने बताया कि इस तरह के आयोजन समाज की पहचान और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आने वाली पीढ़ियों को भी इन परंपराओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत आगे बढ़ती रहे।

संस्कृति और उत्साह का अनूठा संगम

फागोत्सव के इस आयोजन में समाज के पदाधिकारियों, कमेटी सदस्यों, युवाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पूरे आयोजन के दौरान रंग, उमंग और उत्साह का माहौल बना रहा।

जैसलमेर की इस पारंपरिक फाग गैर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजस्थान की लोकसंस्कृति और त्योहारों की परंपराएं आज भी जीवंत हैं। चंग की थाप और फाग गीतों की गूंज ने स्वर्ण नगरी को होली के रंगों से सराबोर कर दिया और समाज में भाईचारे तथा एकता का संदेश दिया।


Content Editor

Payal Choudhary

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