राजस्थान में AI तकनीक से जन्मा गोडावण का चूजा: जैसलमेर ब्रीडिंग सेंटर में संख्या बढ़कर 70, संरक्षण को मिली नई उम्मीद
Sunday, Mar 15, 2026-12:35 PM (IST)
राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित सम-सुदासरी गोडावण कैप्टिव ब्रीडिंग सेंटर में राज्य पक्षी गोडावण के दो नए चूजों का जन्म हुआ है। इन नए चूजों के जन्म के साथ ही सेंटर में गोडावणों की संख्या बढ़कर 70 हो गई है। वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
Great Indian Bustard यानी गोडावण भारत के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षियों में से एक है। इसकी घटती संख्या को देखते हुए राजस्थान में इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
अलग-अलग वैज्ञानिक तरीकों से हुआ जन्म
वन विभाग के अनुसार इन दोनों चूजों का जन्म अलग-अलग तरीकों से हुआ है। एक चूजा प्राकृतिक मिलन से पैदा हुआ है, जबकि दूसरा कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination – AI) तकनीक से जन्मा है।
गोडावण जैसे संवेदनशील और कम प्रजनन दर वाले पक्षी में AI तकनीक का सफल उपयोग वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उन पक्षियों के संरक्षण में मदद मिलेगी जो प्राकृतिक रूप से प्रजनन नहीं कर पा रहे थे।
केंद्रीय मंत्री ने दी बधाई
इस उपलब्धि पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री Bhupender Yadav ने खुशी जताई और राजस्थान वन विभाग की टीम को बधाई दी।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के पर्यावरण-संवेदनशील नेतृत्व में यह परियोजना बड़ी सफलता की ओर बढ़ रही है।
‘प्रोजेक्ट गोडावण’ के तहत संरक्षण
गोडावण संरक्षण के लिए चलाए जा रहे ‘प्रोजेक्ट गोडावण’ के तहत वैज्ञानिकों ने एक विशेष रणनीति अपनाई है। इसके अंतर्गत असुरक्षित प्राकृतिक आवासों से गोडावण के अंडों को सुरक्षित निकालकर उन्हें इनक्यूबेटर में विकसित किया जाता है।
इस प्रक्रिया से अंडों को शिकारियों और अन्य खतरों से बचाकर सुरक्षित तरीके से चूजों का पालन-पोषण किया जाता है।
जंगल में छोड़ने की तैयारी
वन विभाग के अनुसार इस वर्ष कुछ गोडावणों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने के लिए ‘सॉफ्ट रिलीज’ प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इस प्रक्रिया के तहत पक्षियों को सीधे जंगल में नहीं छोड़ा जाता, बल्कि पहले उन्हें बड़े सुरक्षित बाड़ों में रखा जाता है। यहां वे प्राकृतिक माहौल में भोजन ढूंढना और जंगली कुत्तों तथा लोमड़ियों जैसे शिकारियों से बचना सीखते हैं।
जब विशेषज्ञों को भरोसा हो जाता है कि पक्षी प्राकृतिक वातावरण में खुद को सुरक्षित रख सकते हैं, तब उन्हें पूरी तरह खुले जंगल में छोड़ दिया जाता है।
कभी 150 से भी कम रह गई थी संख्या
वन अधिकारियों के अनुसार एक समय ऐसा भी था जब पूरी दुनिया में गोडावण की संख्या घटकर 150 से भी कम रह गई थी।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए राजस्थान वन विभाग और वैज्ञानिकों ने मिलकर संरक्षण की इस विशेष योजना को शुरू किया। आज राजस्थान ही वह जगह है जहां गोडावण का एक्स-सिटू संरक्षण सफलतापूर्वक किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय शोध का केंद्र बना जैसलमेर
जैसलमेर का यह गोडावण ब्रीडिंग सेंटर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां किए जा रहे शोध और संरक्षण प्रयासों को देखने के लिए कई देशों के विशेषज्ञ भी आते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना इसी तरह सफल रही, तो आने वाले वर्षों में थार के आसमान में गोडावण की संख्या फिर से बढ़ती हुई दिखाई दे सकती है।
