CAPF सुधार विधेयक: आंतरिक सुरक्षा को मजबूत बनाने का जरूरी कदम
Thursday, Mar 26, 2026-03:21 PM (IST)
जयपुर। केंद्र सरकार ने हाल ही में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 राज्यसभा में पेश किया है। इस बिल का मकसद सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ और एसएसबी जैसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के ग्रुप 'ए' अधिकारियों की भर्ती, सेवा शर्तें, पदोन्नति और कैडर प्रबंधन को एक छत के नीचे लाना है। अभी तक ये सब अलग-अलग नियमों और सरकारी आदेशों से चलता था, जो काफी उलझा हुआ और अदालती लड़ाइयों का कारण बनता था। सरकार का कहना है कि यह बिल पुरानी खामियों को दूर करके सुरक्षा बलों को ज्यादा संगठित, पारदर्शी और प्रभावी बनाएगा।
क्यों है यह बिल जरूरी?
हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन CAPF बलों पर ही है — सीमा पर पहरेदारी, आतंकवाद और नक्सलवाद से लड़ाई, बड़े कार्यक्रमों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था में मदद। ये बल करीब 10 लाख जवानों के साथ काम करते हैं। लेकिन उनके ग्रुप 'ए' अधिकारियों (लगभग 13,000) की सेवा शर्तें और प्रमोशन के नियम बिखरे हुए थे। इससे कई बार अदालतों में मामले जाते थे। सरकार अब एक व्यापक कानून लाकर सब कुछ साफ-सुथरा और कानूनी रूप से मजबूत करना चाहती है। इससे भविष्य में अनिश्चितता कम होगी और बल ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर सकेंगे।
मुख्य आलोचनाएं और सच्चाई
कुछ सीधे भर्ती हुए CAPF अधिकारियों और उनके संगठनों का कहना है कि यह बिल उनके प्रमोशन के रास्ते को रोक रहा है और आईपीएस अधिकारियों को ज्यादा तरजीह दे रहा है। वे सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हैं, जिसमें कैडर अधिकारियों को 'ऑर्गनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' (OGAS) का दर्जा देने की बात थी। लेकिन बिल को ध्यान से पढ़ें तो सच्चाई कुछ और है। सरकार ने नए अतिरिक्त वरिष्ठ पद (जैसे एडीजी और एसपी स्तर के ज्यादा पद) बनाने का प्रावधान रखा है। इससे प्रमोशन का पिरामिड चौड़ा होगा और ज्यादा अधिकारियों को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति (deputation) लंबे समय से चल रही प्रथा है। वरिष्ठ स्तर पर 50% आईजी पद, 67% एडीजी पद और ऊपरी सभी डीजी पदों पर आईपीएस अधिकारियों को रखने का प्रावधान है।
क्योंकि देश की सुरक्षा में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय बहुत जरूरी है। आईपीएस अधिकारी राज्य पुलिस से जुड़े रहते हैं, अंतर-राज्य समन्वय और रणनीतिक नेतृत्व लाते हैं। जबकि CAPF के कैडर अधिकारी जमीनी स्तर पर बेहतरीन काम करते हैं— उग्रवाद वाले इलाकों में ऑपरेशन चलाते हैं। दोनों की अपनी-अपनी ताकत है। बिल इन्हें एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखता है, न कि विरोधी के रूप में।
फायदे क्या होंगे?
स्पष्ट नियम: भर्ती, प्रमोशन, ट्रांसफर, अनुशासन और कल्याण के नियम अब कानून की किताब में होंगे। ये बदलते अधिकारियों या आदेशों पर निर्भर नहीं रहेंगे।
बेहतर समन्वय: आतंकवाद, नक्सलवाद और हाइब्रिड खतरे जैसे मुद्दों पर केंद्र और राज्य बेहतर तरीके से साथ काम कर सकेंगे।
जवानों का कल्याण: सेवा शर्तें मजबूत होने से मेडिकल सुविधा, परिवार की देखभाल और समय पर प्रमोशन जैसी चीजें ज्यादा सुनिश्चित होंगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा: माओवाद प्रभावित इलाकों में पहले की तरह सुधार जारी रखने के लिए मजबूत और एकीकृत कमांड जरूरी है।
बिल कैडर बनाम आईपीएस की लड़ाई नहीं
आम आदमी के नजरिए से आम नागरिक के लिए सुरक्षा बलों में झगड़े नहीं, बल्कि मजबूत और एकजुट ताकत चाहिए। जब सीमा पर या नक्सल इलाकों में जवान ड्यूटी करते हैं, तो उन्हें पता होना चाहिए कि उनका नेतृत्व सक्षम है और सिस्टम उनके साथ है। यह बिल 'कैडर बनाम आईपीएस' की लड़ाई नहीं है। यह आंतरिक सुरक्षा को और मजबूत बनाने का प्रशासनिक सुधार है। जहां जरूरत पड़े, वहां और ज्यादा पद सृजन करके प्रमोशन के रास्ते खोलने की भी कोशिश है। सरकार का प्रयास है कि पुरानी उलझनों को खत्म करके CAPF बलों को एक आधुनिक, सुसंगत और प्रभावी सुरक्षा ढांचा मिले। अगर बिल में कोई कमी है तो संसद में चर्चा होनी चाहिए और जरूरी सुधार किए जा सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर, यह कदम देश की सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में सही और जरूरी लगता है। आंतरिक सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए— क्योंकि आखिरकार, सुरक्षा हर भारतीय की चिंता है।
